साँच कहै ता- जयराम शुक्ल

पहले तीन सच्चे किस्से फिर आगे की बात

एक-

यह सचमुच हैरत में ड़ालने वाली बात थी। सत्ताधारी दल के राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त एक महाशय ने जो ग्लानिपूर्वक सुनाया उसे आप पढ़े- मेरा ड्राइवर अनुसूचित जातिवर्ग से था। कोई पाँच साल से घर की कार चलाने के साथ और भी छोटे-मोटे काम करता। एक तरह से पारिवारिक हो चुका था। हम उसकी और उसके परिवार की जरूरतों पर ध्यान देते थे। कुलमिलाकर अच्छा चल रहा था कि इसी बीच ये एट्रोसिटी एक्ट का मसला आ गया।
 मैं आमतौर पर दौरे में ही रहता हूँ। हाल ही भोपाल लौटा तो पत्नी ने ड्राइवर के बदले व्यवहार के बारे में चर्चा की। बताया ये अब पहले वाला नहीं रहा, बात बात में अकड़ता है।
एक दिन तो ऐसा लगा बाजार में सरेआम इज्जत ही उतार देगा। हुआ यह कि मैं शापिंग करके लौटी तो देखा कि कार स्टार्ट है, एसी और फुल साउंड डेक चल रहा है और ये सीट लंबी करके लेटे-लेटे मोबाइल पर चैट कर रहा है। खटखटाने पर मुश्किल से उठा और दरवाजा खोला। मैने उसकी इस हरकत पर डा़टा तो वह ढी़ठ जुबान भिड़ा बैठा- मैडम आप तो माँल में तफरी कर रहीं थी अपन कोई ढोर-डंगर थोड़ी न हैं, आदमी ही तो हैं। हाँ आइंदा जरा सोच समझ के बात करिए.....मेरी पत्नी यह सुनकर सक्क रह गई।
 मेरी समझ में नहीं आया कि अब ड्राइवर को कैसे डील करूँ। ड़ाटूँ तो कहीं थाने जाके रपट लिखा दिया तो अपनी और पार्टी दोनों की किरकिरी होगी। सो मैंने संयत भाव से कहा कि न जमे तो कहीं और इंतजाम कर लो भाई। उसने अभद्रता के साथ जवाब दिया- मैडम ने चुगली की होगी, अब कल काहे को आज ही अभी आपकी ड्रायवरी को यूँ लात मारे देता हूँ। ऐसा कहते, भुनभुनाते हुए वह चला गया।
इधर मैं सन्न...! फिर स्टाफ को बुलाकर कहा कि उसे एक महीने की एडवांस तनख्वाह देकर कार की चाभी ले लेना और कल से हाथ जोड़ लेना। राजमंत्री दर्जा प्राप्त मेरे इन मित्र की बातों पर मुझे अविश्वास का कोई कारण नजर नहीं आता..।

दो

मेरे एक रिश्तेदार हैं पति-पत्नी दोनों सरकारी नौकरी में। दोनों की अच्छी खासी तन्ख्वाह है। एक दिन उनके घर गया तो श्रीमतीजी फर्श पर पोछा लगा रहीं थी और श्रीमानजी घर का जाला साफ कर रहे थे। मैंने पूछा वो कामवाली बाई कहाँ गई? वे बोले छुट्टी कर दी, अब कौन झंझट मोल ले, हम सरकारी मुलाजिम हैं, नौकरों के कामकाज का तरीका तो आप जानते ही हैं, मुँह से उल्टा सीधा निकल गया तो भोगो एट्रोसिटी एक्ट।
 मैंने कहा ऐसा भी डिफेंसिव होने की क्या जरूरत है? वे थोड़ा खुले और बताया कि घर में सीसीटीवी लगा है....एक दिन ड्रेसिंग टेबिल की दराज से मिसेज के कुछ गहने निकल गए। फुटेज में सबकुछ पकड़ में आ गया पर हम चुप ही रहे। पुलिस में रिपोर्ट कराने की हिम्मत नहीं पड़ी। कि कहीं वो कांउटर रिपोर्ट कर दे तो लेने के देने पड़ जाएं। सो अब तो भइया इन लोगों से सौ हाथ दूर  ही..इनकी कथा से मैं सन्न नहीं हुआ क्योंकि अगला अनुभव हमारा अपना था..। वो भी सुनिए..।

तीन

मेरी श्रीमती बच्चों को पढ़ाती हैं। घर के एक हिस्से में उनका शिक्षण संस्थान है। पीएमटी और बोर्ड की परीक्षाओं की तैय्यारी करने वाले बच्चे पढ़ने आते हैं। उनमें सभी जातिवर्ग के हैं। इधर हमारे पड़ोस में कई श्रमिक परिवार किराए से रहते हैं। उनके दर्जन भर बच्चे स्कूल जाने की बजाए वहीं धमाचौकडी मचाए रहते हैं।
 मैंनें तरकीब सुझाई कि जब टाइम मिले एक घंटे इन बच्चों को भी बैठाकर पढ़ा दिया करो, शैतानी करना बंद कर देंगे। बच्चों के पिता मेहनतकश मजदूर हैं और उनकी मम्मियां एक रूपये वाला राशन ठिकाने लगाने में भिड़ी रहती हैं। बच्चों को पढ़ाने का प्रस्ताव सुनकर वे सभी खुश हुए। पिछले साल भर से प्रायः सभी बच्चे खाली समय में आ जाते थे।
    ये पिछले दस-पंद्रह दिन पहले की बात है, शायद जिसदिन शहर बंद था उस दिन की बात। बच्चे सड़क पर उधम मचा रहे थे। श्रीमती ने अपने मास्टरी अंदाज में उन्हें डाँटा तो वे भागकर अपने-अपने घर चले गए। इतवार के दिन फिर सभी बच्चों को पढ़ने के लिए तलब किया। वे अपना-अपना बस्ता लेकर आए। श्रीमती ने बताया- इस बीच एक बच्चा उठा और कुछ कहना चाहा, मैंने कहा बोलो क्या बात है? बच्चे ने अपने बगल में बैठे हुए दूसरे बच्चे की ओर इशारा करते हुए कहा- जानती हैं मैड़मजी उस दिन जब आप हम लोगों को डाँट रहीं थीं न.. तो ये कह रहा था कि थाने में जाके रिपोर्ट लिखा देंगे तो वहीं जेल में पढ़ा लेंगी बड़ी आईं डाँटने वाली। ऐसा कहने वाला बच्चा कोई छः साल का है इसी साल से स्कूल जाना शुरू किया है।
 श्रीमती ने ये वाकया बताया तो मैं हतप्रभ रह गया। संभव है घर में  कुछ इस तरह की ही बातें होती हों। जहर नस-नस तक भींज रहा है यकीनन।
ऐसे कई वाकयातों से इनदिनों आप सब का वास्ता पड़ रहा होगा, ऐसा मैं मानता हूँ।

 और अब आगे

ये तीनों सच्चे किस्से यह महसूस करने के लिए पर्याप्त हैं कि एट्रोसिटी के नाम से शुरू हुआ ये सियासी जहर कितने नीचे स्तर तक भींज चुका है। सुप्रीम कोर्ट के फैंसले फिर संसद में उस कानून के पलटने और अब सवर्णों की उग्र प्रतिक्रयाओं के बीच समाज में अंदर ही अंदर काफी कुछ खदबदा सा रहा है। यह सोच इतनी जल्दी गहरे तक पहुंच जाएगी सामान्य जन को इसको अनुमान नहीं।

एक अदृश्य खिंचाव शुरू हो गया है। पहले किस्से से यह संकेत मिलता है कि एट्रोसिटी एक्ट से सबसे ज्यादा वो भयभीत हैं जो सार्वजनिक जीवन में काम करते हैं, इसमें सवर्ण नेता भी शामिल हैं। चूंकि यह सक्षम वर्ग है यदि इसके खिलाफ कोई झूठी शिकायत भी दर्ज होती है तो यहां सबल बनाम निबल का न्याय सिद्धांत लागू होगा। और उसे विस्तारित करने के लिए मीडिया है ही जो अदालत से पहले ही ट्रायल शुरू कर देता है।
 सो अब घरेलू कामकाज में लगे अनुसूचित जातिजनजाति के लोगों को लेकर विश्वास का संकट सामने खड़ा है। पहले किस्से का निष्कर्ष बताता है कि यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है। प्राइवेट सेक्टर इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा सतर्क हो रहा है। अभी निजी और घरेलू क्षेत्र इस वर्ग के लोगों का सबसे बड़ा नियोजक और नियोक्ता है। एट्रोसिटी एक्ट के भय से उपजे अविश्वास के चलते यदि प्रायवेट और डोमेस्टिक सेक्टर ने इस बिरादरी को ऐसे ही कामपर रखना बंद कर दिया तो क्या होगा..? क्या सरकार अपने मत्थे इनका पोषण कर पाएगी? समाजशास्त्रियों को पिछले एक महीने की स्थिति पर अध्ययन सर्वे करना चाहिए।

दूसरे किस्से से एक महत्वपूर्ण संकेत यह उभरता है। एट्रोसिटी की छतरी के नीचे खड़े लोग यदि छोटा-मोटा अपराध करते हैं तो उसे सहना पड़ेगा। आपनकी रिपोर्ट का कोई मतलब नहीं। जाँच अधिकारी सौबार हिम्मत जुटाएगा पूछताछ के लिए। यदि वह भी सवर्ण है तो मुश्किल ज्यादा। क्योकि उसके खिलाफ भी रिपोर्ट किए जाने का आसन्न खतरा है। कुलमिलाकर एफआईआर दर्ज होने से लेकर आगे की प्रक्रिया के खिलाफ एट्रोसिटी एक्ट का एक अभेद्य कवच होगा..। जबकि दूसरी ओर महज एक अर्जी देने के साथ ही गिरफ्तारी तय। कोई अग्रिम जमानत नहीं..। संसद में कानून को सख्त किए जाने के बाद मीडिया और जुबानीजमा जो प्रचारित हो रहा है उसके स्थाई भाव यही हैं।

तीसरा किस्सा अत्याधिक चिंतनीय है। जब एक अबोध बालक एट्रोसिटी एक्ट में बंद कराने की धमकी को लेकर सोचने और बोलने लगे तो समझ लीजिए भविष्य में क्या होगा। आज नहीं तो कल स्कूलों में एक साफ विभेद शुरू हो जाएगा। सरकारी स्कूल और उसके मास्टर तो कैसे भी नियति मानकर इसे स्वीकार करेंगे और भोगेंगे। निजी क्षेत्र की पब्लिक स्कूलों में इस वर्ग के बच्चों के एडमिशन के लिए संचालक कई कई बार सोचने लगेंगे। फिर सरकार को इसके लिए भी कानून बनाना पड़ेगा।

समाज में अविश्वास का ऐसा संकट शायद पहली बार देखने को मिल रहा है। तदनुसार उसकी अभिव्यक्ति भी सड़कों पर आक्रोश बनकर फूट रही है। पुराने एट्रोसिटी एक्ट में क्या संशोधन हुआ? उसको लेकर अभी तक मीडिया रिपोर्ट और नेताओं के बयान भर पढ़ने-सुनने को मिले हैं। अभी विधिसम्मत नोटीफिकेशन कहीं देखने को नहीं मिला है। यह भी हो सकता है कि इस कानून में ऐसा कुछ न भी हो पर वातावरण जिसतरह से निर्मित हो रहा है वह ऐसा ही है जैसा कि मैंने बयान दिया।

क्या सरकारों को यह नहीं मालूम कि इस बहुप्रचारित कानून के जरिये एक सिविल वाँर की बुनियाद रख दी गई है? किसी भी दल का कोई नेता इसपर क्यों नहीं बोल रहा? हर मसले पर टपक पड़ने वाले बुद्धिजीवी और कलमची भी मौन हैं। बड़े वकील चुप हैं। माओवादियों के मानवाधिकार पर मार्च करने वाली सिविल सोसायटी समाज को इस तरह गुँगुआते हुए देखकर आनंदित है। एट्रोसिटी एक्ट की सबसे ज्यादा पैरवी करने वाले और इसे संविधान का हिस्सा बनाने में खुद को झोक देने वाले ज्यादातर सवर्ण जनप्रतिनिधि ही हैं।
   तो क्या ऐसी स्थिति पर एट्रोसिटी की छतरी ओढने वाले वर्ग के जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे ही आगे आएं और समाज में फैल रहे भ्रम के जहरीले कुहासे को छाँटने में मदद करें। केंद्र व राज्य की सरकारें इस कानून और इससे उत्पन्न आसन्न संकट पर एक स्वेतपत्र क्यों नहीं जारी क्यों नहीं करते? शायद इन्हें इंतजार है आगे और कुछ होने का। इतिहास इस बात का गवाह है कि सियासत आम आदमी के लहू से ही सुर्ख रंगत पाती है।

पुनश्चः

यह लेख लिखने के दरम्यान ही किसी ने अपने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के उस ट्वीट की ओर ध्यान खींचा जिसमें उन्होंने कहा है कि- एससीएसटी एक्ट का मध्यप्रदेश में दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा, जाँच के बाद ही गिरफ्तारी होगी" इस घोषणा की विधिक पड़ताल भी शुरू हो गई। पर यह संतोष की बात है कि आसन्न संकटपर विचार शुरू तो हुआ..।

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