चर्चे चुनाव के -जयराम शुक्ल
 
मध्यप्रदेश की राजनीति में चुरहट सबसे चर्चित नाम है। चुरहट के गढ़ भेदने की व्यूहरचना भाजपा के एजेंडे में हमेशा सर्वोपरि रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और नेताप्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल के बीच शुरू हुई तल्खियों ने चुरहट को इस बार फिर चुनावी राजनीति के हाटसीट पर बैठा दिया। चुरहट की देशव्यापी प्रतिष्ठा अर्जुन सिंह की वजह से हुई यह बताने की जरूरत नहीं। 
 
राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले प्रायः यही मानते हैं कि चुरहट अर्जुन सिंह और उनके परिवार के लिए अजेय दुर्ग की भाँति है। जबकि ऐसा नहीं है। अर्जुन सिंह यहां से चुनाव हारे भी और हार की डर से चुरहट को छोड़ा भी।
 
चुरहट के चुनावी किस्से बेहद दिलचस्प हैं। यहां चक्रव्यूह से लेकर वो हर नैतिक-अनैतिक दाँव खेले जाते रहे हैं जिन्हें महाभारत कथा में सुनते आए हैं। वे किस्से इसी श्रृंखला में आगे कभी, पर इस बार अर्जुन सिंह के रणछोड़ने का किस्सा।
 
प्रतिभा के धनी अर्जुन सिंह ने 1957 में पहला चुनाव निर्दलीय लड़ा। राजनीति के आरंभकाल में सोशलिस्ट पार्टी से प्रभावित थे लिहाजा टिकट भी माँगी थी। सीधी में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का जोर था और उसके हर आंदोलन के लक्ष्य में चुरहट की जागीरदारी और सामंतशाही रहती थी। इस वजह से प्रसोपा नेतृत्व ने इन्हें विश्वास योग्य नहीं समझा। 1957 की चुनावी जीत के बाद मध्यप्रदेश की पहली विधानसभा में ही अर्जुन सिंह ने अपनी मेधा से कांग्रेस के नेतृत्व का ध्यान खींचा। पंडित नेहरू जिन्होंने देश के पहले चुनाव में अर्जुन सिंह के पिता रावसाहब चुरहट शिवबहादुर सिंह को सरेआम बेइज्जत किया था, ने जल्द ही अर्जुन सिंह को अपना स्नेहपात्र बना लिया लिहाजा 1962 का चुनाव अर्जुन सिंह  चुरहट से काँग्रेस की टिकट पर लड़े और भारी बहुमत से चुने गए। वे डीपी मिश्र के इतने करीब आ गए कि उन्होंने अपनी कैबिनेट में शामिल कर लिया।
 
इधर सोशलिस्ट नेता चंद्रप्रताप तिवारी जो कि विपक्ष में रहते हुए भी डीपी मिश्र के मुँहलगे थे ने घोर आपत्ति जताई। डीपी मिश्र कुछ समय के लिए काँग्रेस छोड़कर प्रसोपा में आ गए थे तिवारी जी की निकटता इसलिए बनी। बहरहाल अर्जुन सिंह को मंत्री बनाने की आपत्ति पर मिश्रजी ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि वे अपनी राजनीति देखें यहां टाँग न अड़ाएं। बस क्या राजनीति में दुर्वासा के नाम से सरनाम चंद्रप्रताप तिवारी डीपी मिश्र को ही चुनौती दे आए कि अर्जुन सिंह को मंत्री तो बना दिया अगला चुनाव जितवा देना तो देखेंगे। चंद्रप्रताप ने विधानसभा में ही चुरहट से अर्जुन सिंह के खिलाफ लड़ने का डंका पीट दिया। विंध्य की राजनीति में चंद्रप्रताप वर्सेस अर्जुन सिंह का रण शुरू हुआ और 1967 का चुनाव आ गया। 
 
यह अबतक का सबसे ऐतिहासिक चुनाव था जिसमें साम-दाम-दंड-भेद अपनाया गया। यह पूरा किस्सा कभी अलग से सुनने-सुनाने लायक है लेकिन इस चुनाव में "पंडित चंद्रप्रताप तिवारी" ने "कुँवर अर्जुन सिंह बघेल" को चारो खाने चित्त कर दिया। तिवारी जी ने फोन लगाकर खुद ही डीपी मिश्र को इसकी सूचना दी मैंने तुम्हारे कुँवर को हरा दिया जो करना हो कर लो। 
 
चाणक्य डीपी मिश्र को चंद्रप्रताप तिवारी की इस चुनौती ने फिर एक पालटिकल ट्विस्ट का मौका दे दिया। अब रीवा नरेश मार्तण्ड सिंह की भूमिका शुरू हुई।
 
 शहडोल उमरिया के इलाकेदार रणविजय प्रताप सिंह इसी चुनाव में काँग्रेस की टिकट से विधायक चुने गए थे। मार्तण्ड सिंह ने उन्हें अर्जुन सिंह के हक में उमरिया विधानसभा सीट से इस्तीफा देने को मनाया। उमरिया में छः महीने के भीतर  उपचुनाव हुआ और अर्जुन सिंह यहां से चुनकर विधानसभा पहुंचे।
 
कहते हैं राजनीति तड़ित की तरह चंचल और भुजंग की भाँति कुटिल होती है..67 में प्रसोपा की टिकट से जीतकर विधानसभा पहुंचे। इस बीच संविद सरकार बनी-बिगड़ी और चंद्रप्रताप तिवारी कांग्रेस में शामिल हो गए। प्रकारांतर में सेठी मंत्रिमंडल में मध्यप्रदेश के अबतक के सबसे चर्चित वनमंत्री रहे। उसी कैबिनेट में अर्जुन सिंह भी थे शायद कृषि व बाद में शिक्षामंत्री के रूप में। लेकिन चंद्रप्रताप तिवारी ने अर्जुन सिंह से चुरहट की राजनीतिक इलाकेदारी तो छीन ही ली थी। 1972 का चुनाव अर्जुन सिंह ने चुरहट से नहीं अपितु सीधी विधानसभा सीट से लड़ा। वे चुरहट तब लौटे जब चंद्रप्रताप तिवारी ने इमरजेंसी के बाद कांग्रेस को तिलांजलि दे दी।