इन्दौर । अभ्यास मंडल की 60 वीं ग्रीष्मकालीन  व्याख्यानमाला के पांचवे दिन गत दिवस इंदौर में आयुक्त एवं सचिव जनसंपर्क श्री पी. नरहरि ने संबोधित करते हुए कहा कि हम सब का जीवन पानी से ताल्लुक रखता है। जीवन वही है जो प्रवाहमान है, वरना जीवन नहीं। जीवन को प्रवाहमान बनाए रखने में पत्रकारिता महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता में प्रिंट और दूसरा इलेक्ट्रानिक मीडिया ये दोनों महत्वपूर्ण हैं। आज सोशल मीडिया बाकी दो पर हावी हो रहा है। फटाफट परोसा जाने वाला सोशल मीडिया जीवन पर तेज गति से प्रभाव डाल रहा है।
श्री नरहरि ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि जब जीना ही है तो आराम से जिएं। ये तीसरा नई पीढी का मीडिया जीवन को तेजी से प्रभावित कर रहा है, फोटो-सेल्फी, विचार ट्विटर सब इस पर है। मोबाइल फोन जीवन से चिपक सा गया है। सोशल मीडिया की घुसपैठ जीवन को प्रभावित कर रही है। आने वाले समय में सोशल और डिजिटल मीडिया प्रिंट, इलेक्ट्रानिक मीडिया को खत्म कर देगा। अब चैनल ऑनलाईन होते जा रहे हैं। अमरीका में प्रिंट मीडिया तेजी से खत्म हो रहा है।
सोशल मीडिया में विश्वसनीयता का भी बड़ा सवाल है। हम को मीडिया की शत प्रतिशत आवश्यकता है लेकिन इस दौर में विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण है, पत्रकारिता के क्षेत्र में तो यह बहुत जरूरी है। दस रूपये के पेपर में आठ रूपये मार्केट दे रहा है तो वह अपनी शर्तें भी लादेगा ही। सोशल-ऑनलाइन मीडिया पत्रकारिता के स्तंभों पर अटैक कर रहा है। अब चैनल चेंज करिए सब पर एक साथ एड मिलेगा। 7 बजे न्यूज आता था अब 6.55 पर आता है, पांच मिनट विज्ञापन देखना ही होगा। मार्केट फोर्सेस है, हम सरकारी क्षेत्र से हैं मार्केट फोर्सेस हैं, हम भी प्राईम टाईम पर एड देते है। बिना रिसर्च किए, जांचे परखे न्यूज-व्यूज थोपा जा रहा है, यह प्रभावित हो रहा है पहले ब्रेक करने की होड़ में। सत्यता, रिसर्च, जांच तक नहीं किया जाता। ये फटाफट न्यूज में विश्वसनीयता समाप्त हो रही है।
पत्रकारिता के क्षेत्र में भारतीय भाषाओ का विकास तो हुआ है। इस नए सोशल मीडिया में लेकिन भाषाओं में सहजता-सरलता के चक्कर में भाषा की मौलिकता समाप्त हो रही है। नई संस्कृति में भाषा गुम होती जा रही है। मप्र की जितनी भी नदियों के नाम बताए हैं भोपाल. इंदौर, ग्वालियर, सिंगरोली, छिंदवाड़ा आदि में जो उपभाषा है, स्थानीय भाषा, स्थानीय संस्कृति, सभ्यता खत्म हो रही है। अपनी क्षेत्रीय भाषा का मान सम्मान बनाए रखना है, इसकी अवहेलना ना हो।
पत्रकारिता में मार्केंट फोर्सेस के अटैक बढ़ने से पत्रकारिता प्रभावित हो रही है। बाजारवाद प्रभावशाली न बने। पत्रकारिता में महिला, बच्चों, बुजुर्गों के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए। मैंने संपादकों को पत्र भी लिखा है कि आत्महत्या जैसी खबरों को कम से कम दर्शाएं। पॉजिटीव खबरों को ज्यादा दर्शाएं। यह बेहतर बदलाव में सहयोगी होता है। सरकारी विज्ञापनों के हमारे सारे कैरेक्टर मुस्कुराते हुए रहना चाहिए। अपनी पत्रकारिता को पॉजिटिव कैसे बनाएं इस पर काम होना चाहिए। नेगेटिव चीजें समाप्त करने के साथ ही समाज के फेलुअर को स्वीकारने का भा साहस होना चाहिए।
श्री नरहरि ने बताया कि आंध्रा में मेरे आई.ए.एस. बनने की स्टोरी एक बच्ची ने पढ़ी कि बगल वाले गांव का बच्चा आईएएस बना। उसने तय किया कि हम क्यों नहीं बन सकते। वह महिला ने इसे पॉजिटिव लिया। सिंगरोली कलेक्टर था तो मिलने आई कि आप की स्टोरी पढ़ कर मैंने आईएएस की तैयारी की, वह बन गई। ऐसे ही आठवीं के बच्चे से छिंदवाड़ा में पूछा था क्या बनोगे। वह बोला कलेक्टर बनूंगा, मैंने कहा खूब तैयारी करो, वह २०१७ बैच का कलेक्टर बना। यह समाचार पत्रों के माध्यम से प्रेरणा बनकर प्रवाहित हुआ। ऐसे ही हमारी नदियां प्रवाहमान रहे, नदी की तरह प्रवाहमान, शांत रहे पत्रकारिता और जब जरूरत हो तो वह ब्रह्मपुत्र नदी की तरह समाज सुधार के लिए रौद्र रूप भी दिखाए।
लोकतंत्र में मीडिया की व्यवस्था यही है। अब पेड न्यूज, पैकेज में आ गया है। अब नया सिस्टम आ गया है। एक फोटो और दो कॉलम इनका, दो कॉलम उनका छापा, जो नहीं दे पा रहे उनका नहीं छापा-यह नई तरकीब है । आम आदमी को मीडिया लिटरेसी से अवगत कराना जरूरी है। विकीलिक्स के असांज ने इतनी चीजें सामने लाए, जिस दिन यह चौथा स्तंभ पत्रकारिता में हमारी हर न्यूज सही हो। फेक न्यूज इतना बढ़ गया है कि ६२ प्रतिशत लोग फेक न्यूज बिना पढे, देखे पहले फारवर्ड करते हैं। 
हमे असली मुद्दों पर काम करने की आवश्यकता है ये मुद्दे वही हैं जो आराम से जीने दे, पानी जैसा कलकल बहता जीवन हो, जीवन की नदी पर कितने भी बांध बन जाए लेकिन हमें मुडने, जीवन जीने का प्रवाह देता है वही पत्रकारिता है। सोशल मीडिया का एक अच्छा पक्ष सामने आया है कि लोग तेजी से अपने विचार व्यक्त कर रहे है चैलेंज हर फील्ड में हैं भले ही कितने भी मीडिया आए, असली विचार की मृत्यु कभी नहीं हो सकती है। नदी की तरह प्रवाहमान विचार आने दो। बहते रहना बहुत जरूरी है। मैं आशावादी हूं, युवा पीढ़ी को मार्गदर्शन की आवशकता है। हम सब का प्रयास हो कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनी रहे। सीमा पर जवान की तरह पत्रकार कलम से आंतरिक रक्षा करता है। अपने बच्चों के साथ ही स्वयं के लिए भी जीवन जीने की कला सिखाने की जरूरत है। जीवन जीना है तो आराम से जिएं जल्दबाजी में क्यों जिए। मैं टॉप करना चाहता था मेरे पिता कहते थे बेटा पास हो गए क्या। बच्चों को टॉप करने की दौड़ में मत डालिए, जीवन पास हो जाए इससे बेहतर है जीवन जिया जाए। सकारात्मक रूप से जीना है तो बच्चों को कहे कि अपना टाइम आएगा। जो आज पीछे हैं कल आप से आगे आ सकते हैं तो टाईम सबका आएगा, आप का भी आएगा।
व्याख्यानमाला के अध्यक्ष रामेश्वर गुप्ता, उपाध्यक्ष अशोक जायसवाल, माला ठाकुर, प्रेस क्लब अध्यक्ष अरविंद तिवारी, संजय मोगरा, ओपी नरेडा तथा बड़ी संख्या में इंदौर के प्रबुद्ध श्रोता उपस्थित थे।