इन्दौर । हमारा जीवन उस जंगल की तरह है, जिसमें कोई माली नहीं है। जंगल को देखने कोई नहीं जाता, उपवन को देखने सब जाते हैं। उपवन को सौंदर्य देने का काम माली करते हैं। अपने जंगल रूपी जीवन को भी एक ऐसा माली चाहिए,जो माता-पिता, भाई-बहन, गुरू या अन्य कोई भी हो सकता है। आपके घर का नौकर या नौकरानी भी जीवन को संवारने और जंगल को उपवन में बदलने का काम कर सकते हैं। घर में धर्म कम हो जाए तो चलेगा लेकिन शर्म और संस्कार कम नहीं होना चाहिए। हम जिन्हे प्रतिबंध मानते हैं, वे प्रतिबंध नहीं, संरक्षण के लिए होते हैं। मर्यादा की लक्ष्मण रेखा हम सबके जीवन में भी होना चाहिए अन्यथा परिवार की सीता का अपहरण होते देर नहीं लगेगी। सीता के लिए लक्ष्मण रेखा प्रतिबंध थी या संरक्षण के लिए, यह चिंतन भी हमें अपने संदर्भ में करना चाहिए और बच्चों को भी यही समझाना चाहिए। आज रूपया गिरने की बात तो होती है पर रूपये के लिए आदमी कितना गिर रहा हैं, इस पर भी मंथन करना चाहिए। गिरने की भी एक सीमा होती है।
ये दिव्य विचार हैं पद्मभूषण जैनाचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. के जो उन्होने आज दशहरा मैदान पर चल रही परिवर्तन प्रवचनमाला में ‘संस्कार सवारें जिंदगी‘ विषय पर अपने विचारोत्तेजक, प्रेरक और मार्मिक उदबोधन के दौरान व्यक्त किए। अचार्यश्री के प्रवचन श्रवण के लिए बड़ी संख्या में आ रहे श्रोताओं में अधिकांश परिवार के साथ आ रहे हैं। उनका आग्रह भी यहीं है कि इस तरह के जीवन संवारने से जुड़े विषयों पर हो रहे प्रवचनों का लाभ परिवार के युवा बेटे-बेटियों और अन्य सदस्यों को भी मिलना चाहिए। आज प्रवचनमाला का शुभारंभ पूर्व विधायक सुदर्शन गुप्ता, श्रीपाल सखलेचा, रेखा जैन, विजय मेहता, राजकुमार पाटोदी, अनिल भंडारी, दिलीप सी जैन एवं धीरू भाई ने दीप प्रज्वलन कर किया। अतिथियों और संतों की अगवानी मनीष डोसी, हुलास गांग, अशोक लोढ़ा, अनूप जयसवाल, कल्पक गांधी, वीरेंद्र जैन आदि ने की। गुरू वंदना के बाद आचार्यश्री के सान्निध्य में इंद्रलोक कालोनी स्थित सर्वधर्म मंदिर में प्रतिदिन संध्या को संस्कार कक्षाएं लगाने वाले रमेश मामा ने भी इस मौके पर शिविर की जानकारी दी और जादू के करतब भी दिखाए। दशहरा मैदान पर बनाया गया पांडाल प्रतिदिन विस्तारित करना पड़ रहा है। आज भी अनेक श्रोता पांडाल के बाहर पूरे समय जमे रहे। यहां शुक्रवार 31 मई को ‘हर उलझन का एक समाधान‘ विषय पर आचार्यश्री के प्रवचन सुबह 8.45 से 10.15 बजे तक होंगे। प्रवचन स्थल पर आचार्यश्री द्वारा लिखित गृहस्थ जीवन के लिए उपयोगी पुस्तकों का रियायती मूल्य पर विक्रय भी किया जा रहा है।
आचार्यश्री ने कहा कि लकड़ी को फर्नीचर में बदलने के लिए तराशना पड़ता है। पत्थर भी तराशे बिना प्रतिमा नहीं बनता। प्रतिमा तो सबको दिखाई देती है लेकिन शिल्पकार को कोई नहीं जानता। हमें भी अपना जीवन तराशने के लिए एक शिल्पकार चाहिए। जैसे माली जंगल को उपवन में बदलने के लिए कई बार कैंची भी चलाता है, वैसे ही शिल्पकार और गुरू भी हमें तराशने के लिए कड़े उपाय करते हैं। जीवन में रेड सिग्नल, स्पीड ब्रेकर, साईन बोर्ड और सिग्नेचर - ये चारों रिस्ट्रीक्शन हैं जो हमारे जीवन को संयमित बनाने के लिए है लेकिन हम इन्हे प्रतिबंध मान लेते हैं। ये असल में रिस्ट्रीक्शन नहीं, जीवन के लिए प्रोटक्शन हैं। जीवन में आत्मा को परमात्मा बनाया जा सकता है यदि हम निषेध, नियंत्रण, नियम और नीति के अनुसार चलेंगे। इन चारों के बिना संस्कारी जीवन संभव नहीं है। जीवन में अच्छा करना आसान होता है या गलत छोड़ना, इस पर भी चिंतन करें। हमारे जीवन के ड्राफ्टिंग की सार्थकता तभी होगी जब उस पर परमात्मा के साईन होंगे। हम घर में सभी सदस्यों के बीच संपत्ति, सत्ता, सौंदर्य, सेहत, संबध, समय आदि जमाने भर की बातें करते हैं लेकिन शर्म और संस्कार की बातें क्यों नहीं करते। अपने अगले जन्म को बचाना है तो धर्म करते चलो और पाप छोड़ते चलो लेकिन वर्तमान को बचाना है तो बेशर्मी को छोड़ते जाओ और आंखों में शर्म रखते चलो।