Friday, 28 July 2017, 4:09 AM

उपदेश

मनुष्य के शरीर में पंचतत्वों का संतुलन परमावश्यक है

Updated on 16 February, 2015, 13:11
मनुष्य के शरीर में पंचतत्वों का संतुलन परमावश्यक है। मनुष्य जीवन में भौतिक भाव सदैव रहता है, लेकिन हमें इस भाव का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। मनुष्य को अगर वन में छोड़ दें, तब भी प्रकृति उसे भौतिकता का बोध करा ही देती है। प्रकृति में तरह-तरह के पेड़-पौधे और... आगे पढ़े

नृत्य ही पूजा है

Updated on 14 February, 2015, 8:11
मेरे लिए नृत्य ही पूजा है. नृत्य ही ध्यान है. नृत्य से ज्यादा सुगम कोई उपाय नहीं, सहज कोई समाधि नहीं. जितनी आसानी से तुम अहंकार को नृत्य में विगलित कर पाते हो उतना किसी और चीज में कभी नहीं कर पाते. नाच सको अगर दिल भरकर तो मिट जाओगे. नाच... आगे पढ़े

सुख की भीतरी नदी, हमारे दुख के क्या कारण है

Updated on 13 February, 2015, 11:43
महात्मा बुद्ध ने कहा था कि जीवन दुखाय है, किंतु उन्होंने दुख के कारणों और उसे दूर करने के उपायों पर भी प्रकाश डाला है। बुद्ध दुख की नाव पर बैठाकर सुख की भीतरी नदी में ले जाते हैं। धम्मपद का पहले ही पद का अर्थ है- 'मन सभी प्रवृत्तियों का... आगे पढ़े

सत्संग सफलता का प्रवेश द्वार

Updated on 12 February, 2015, 10:51
सत्संग का अर्थ लोग प्रवचन सुनना समझते हैं, लेकिन इसका अर्थ है अच्छे लोगों से मिलना, अच्छी पुस्तकेें पढ़ना, अच्छी बातें सोचना आदि। किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने का यह प्रवेश द्वार है। सत्संगत्वे निस्संगत्वं निस्संगत्वे निर्मोहत्वम। निर्मोहत्वे निश्चलतत्वं निश्चलतत्वे जीवन्मुक्ति:।। अर्थ : सत्संग से निस्संगता पैदा होती है और निस्संगता से अमोह!... आगे पढ़े

अनमोल वचन

Updated on 11 February, 2015, 10:13
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:॥18-48॥ अर्थ : हे कौन्तेय (अर्जुन), अपने आरंभ के सहज-स्वाभाविक कर्म को दोष होने पर भी नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि आरंभ में कर्मों में कोई न कोई दोष होता ही है, जैसे आरंभ में अग्नि धुएं से घिरी होती है...। भावार्थ : जब भी... आगे पढ़े

नर हो ना निराश करो मन को...

Updated on 10 February, 2015, 13:52
जीवन के किसी मोड़ पर असफलता मिलने पर हमें निराश होने की बजाय अदम्य उत्साह और ऊर्जा के साथ लक्ष्य-पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। हार से ही जीतने का रास्ता मिलता है। हारने के बाद हम गलतियों को नहीं दोहराते, तब सफल होने का अवसर आता है। इस... आगे पढ़े

कुछ भी घृणा योग्य नहीं..

Updated on 9 February, 2015, 13:55
मित्रों फूल बन जाती है और गंदगी खाद बनकर सुगंध में परिणत हो जाती है। ऐसे ही मनुष्य के विकार हैं, जो पशु जैसे दिखते हैं, वही दिशा परिवर्तित होने पर दिव्यता बन जाते हैं। वस्तुत: अदिव्य कुछ भी नहीं है। जीवन दिव्यता है। भेद केवल अभिव्यक्ति का है। इस... आगे पढ़े

पूर्ण ज्ञान का मार्ग

Updated on 8 February, 2015, 8:53
एक ज्ञान है, जो भर तो देता है मन को बहुत सारी जानकारी से, लेकिन हृदय को शून्य नहीं करता है. एक ज्ञान है, जो मन को भरता नहीं, खाली करता है. हृदय को शून्य का मंदिर बनाता है. एक ज्ञान है, जो सीखने से मिलता है और एक ज्ञान है... आगे पढ़े

प्रेम और मोह में अंतर

Updated on 7 February, 2015, 13:16
यजुर्वेद में लिखा है कि बुराइयों को द्वेष की अपेक्षा प्रेम से दूर करना ज्यादा सरल है। इसी प्रकार ताओ धर्म कहता है कि प्रेम के आधार पर ही मनुष्य वीर बन सकता है। प्रेम ही है, जो अंधकार को प्रकाश में, निर्जीवता को जीवन में और मरघट को उद्यान... आगे पढ़े

तुम को भूल जाओ..जीवन उत्सव हो जाएगा

Updated on 6 February, 2015, 8:34
कुछ लोग केवल भीड़ में उत्सव मना सकते हैं, कुछ एकान्त में, कुछ मौन में खुशी मना सकते हैं। मैं तुमसे कहता हूं, दोनों करो। एकांत में उत्सव मनाओं और लोगों के साथ भी। अकेले होने पर भीड़ को महसूस करना अज्ञानता है। भीड़ में भी एकान्त महसूस करना बुद्धिमता का... आगे पढ़े

अक्षम नहीं, सक्षम

Updated on 5 February, 2015, 13:35
पैट्रिक हेनरी  अमेरिका के जाने-माने संगीतकार है। उनका संघर्ष उन लोगों के लिए प्रेरणा बन सकता है, जो अपनी शारीरिक अक्षमता या संसाधनों की कमी को ही दोष देते रहते हैं और अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिए कोई प्रयत्न ही नहीं करते। पैट्रिक का जन्म 10 मार्च, 1988 को... आगे पढ़े

प्रेम पर आधारित है पुष्टिमार्ग

Updated on 4 February, 2015, 12:50
वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत दर्शन के आधार पर पुष्टिमार्ग की आधारशिला रखी थी, जिसमें प्रेम प्रमुख भाव है। वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग का प्रतिपादन किया था। उन्होंने ही इस मार्ग पर चलने वालों के लिए वल्लभ संप्रदाय की आधारशिला रखी। पुष्टिमार्ग शुद्धाद्वैत दर्शन पर आधारित है। पुष्टिमार्ग में भक्त भगवान के स्वरूप... आगे पढ़े

औषधि है रामनाम

Updated on 2 February, 2015, 13:11
इलाहाबाद। राम नाम खाते में जमा रामनाम रूपी धन इस लोक के साथ परलोक में भी काम आता है। श्रीराम का नाम जपने वाला व्यक्ति कभी हताश व निराश नहीं होता। देवतीर्थ जगद्गुरु स्वामी अधोक्षजानंद सरस्वती ने उक्त बातें कही। वह शुक्रवार को अक्षयवट मार्ग स्थित रामनाम सेवा संस्थान के... आगे पढ़े

'समय कीमती है, ईश्वर भजन में लगाएं'

Updated on 1 February, 2015, 8:57
सिद्धपीठ कालिका मंदिर, कालका जी में सत्संग सभा में महंत सुरेन्द्रनाथ ने कहा कि जो अपने समय को व्यर्थ खोता है, वह बहुत बड़ा नुकसान करता है। जो समय भगवान के चिंतन-मनन, दूसरों के हित, उपकार के लिए है वह भोग के चिंतन और दूसरों के अहित, अपकार में लगता... आगे पढ़े

शून्य का अर्थ संपूर्ण विसर्जन

Updated on 31 January, 2015, 9:16
शून्य का अर्थ किसी का स्मरण नहीं, समस्त का विसर्जन है. हमने अपने को खोया नहीं है, हमने केवल अपने को विस्मृत किया है. हम अपने को खो सकते ही नहीं. स्वरूप को खोया नहीं जा सकता, केवल विस्मरण है. विस्मरण इसलिए किया कि दूसरी बातों के स्मरण ने चित्त को... आगे पढ़े

समस्या से भागें नहीं, जीवंतता के साथ जिएं

Updated on 30 January, 2015, 12:36
जीवन एक ऐसी नदी है, जिसे कुशलता से पार करने वाला ही विजेता बनता है। इसके लिए उसे समस्याओं के मगरमच्छों का सामना तो करना ही होगा... एक रोमांच पसंद अमीर आदमी ने अपने फॉर्म हाउस में पार्टी रखी। काफी मेहमान आए। पार्टी लॉन में स्वीमिंग पूल था, जिसमें मगरमच्छ तैर... आगे पढ़े

एकाग्रता बढ़ाता है ध्यान

Updated on 29 January, 2015, 14:13
ध्यान हमारी एकाग्रता को इतना बढ़ा देता है कि हमारा हर काम उत्कृष्ट हो जाता है... एक जेन गुरु अपने शिष्यों को ध्यान का प्रशिक्षण दे रहे थे। एक शिष्य उनसे कहने लगा कि अब मैं ध्यान में निष्णात हो गया हूं, अब मुझे लोगों को प्रशिक्षित करने की अनुमति दीजिए।... आगे पढ़े

आत्मा का महत्व शरीर से है

Updated on 27 January, 2015, 10:35
ऐसा माना गया है कि मनुष्य-तन अत्यंत दुर्लभ है और पूर्व जन्मों के पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त होता है। हम प्राय: अपने इस शरीर को ही सब कुछ समझ लेते हैं। इसीलिए संसार में रहकर हम शरीर-सुख के लिए प्रतिपल प्रयासरत रहते हैं, जबकि प्राणी का शरीर तुच्छ है, क्षणभंगुर... आगे पढ़े

इसलिए ईश्वर को पाने में सबसे बड़ी बाधक हमारी बुद्धि है

Updated on 26 January, 2015, 11:31
श्री रमण से किसी ने पूछा था, क्या सीखूं कि मुझे प्रभु उपलब्ध हो जाए? श्री रमण ने कहा, सीखना नहीं है, भूलना है। बहुत स्मरण है, वही बाधा है। जब समस्त स्मरण छूट जाए। स्व-स्मरण जाग्रत हो जाता है। किन्हीं ने पूछा है, जब बुद्धि असफल हो जाती है तो... आगे पढ़े

अभ्यास किसी भी कार्य की कुशलता के लिए परमावश्यक है

Updated on 26 January, 2015, 11:26
अभ्यास किसी भी कार्य की कुशलता के लिए परमावश्यक है। जीवन की सभी परीक्षाओं में सफल होने के लिए अभ्यास सबसे महत्वपूर्ण घटक है। किसी कार्य में विशेषज्ञता, कला में पारंगतता तब प्राप्त होती है जब कार्य व कलाएं ज्ञान के स्वरूप को छोड़कर व्यवहारिकता धारण करती हैं। ज्ञान संबंधी विशेषताओं... आगे पढ़े

दूसरों के प्रति अच्छे नहीं सच्चे बनें

Updated on 25 January, 2015, 9:53
जीवन में ऐसा सभी के साथ होता है कि हमारे नजदीकी मित्रों, रिश्तेदारों या परिचितों को किसी खास मौके पर पैसों की जरूरत होती है और वे हमसे आर्थिक मदद की उम्मीद करते हैं। उस वक्त हमारे पास उनकी मदद करने की क्षमता नहीं होती लेकिन हम उन्हें स्पष्ट मना... आगे पढ़े

व्यष्टि आत्मा और परमात्मा

Updated on 24 January, 2015, 10:30
प्रत्येक जीव एक व्यष्टि आत्मा है. वह प्रतिक्षण अपना शरीर बदलता रहता है. कभी बालक के रूप में, कभी युवा तो कभी वृद्ध पुरुष के रूप में. लेकिन आत्मा वही रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता. वह व्यष्टि आत्मा मृत्यु होने पर अंतत्वोगत्वा एक शरीर बदलकर दूसरे में देहांतरण... आगे पढ़े

हर व्यक्ति के जीवन में दु:ख का एक मात्र कारण और उपचार यह है

Updated on 23 January, 2015, 13:54
अंधकार एक नकारात्मक सत्ता है, प्रकाश का अभाव है। यह प्रकाश कई बार परिस्थितियों के कारण भी लुप्त हो जाता है, किन्तु वैसी स्थिति में परमात्मा ने मनुष्य को वैसी क्षमता दे रखी है कि वह उनका उपयोग कर प्रकाश के अभाव को दूर कर सके। लेकिन अंधकार को देख-देख... आगे पढ़े

उपनिषद में मन: मन की जैसी प्रवृत्ति होती है, वैसा ही मनुष्य बन जाता है

Updated on 23 January, 2015, 13:04
मनुष्य मनोमय है अर्थात मन की जैसी प्रवृत्ति होती है, वैसा ही मनुष्य बन जाता है। आत्मा प्रज्ञा के रूप में मन में प्रतिबिंबित होती है। कौषिति की उपनिषद मन की सक्रियता का आधार आत्मा है और इसको जानने पर बल दिया जाना चाहिए। ज्ञान का आधार तप, संयम और नि:स्वार्थ कर्म... आगे पढ़े

जन्म-मृत्यु के पार एक गहरा रहस्य जानिए ओशो और बुद्ध से

Updated on 19 January, 2015, 12:21
बुद्धत्व के जगत में ओशो के साथ एक नए अध्याय का शुभारंभ हुआ था। एक ऐसा अध्याय, जो अतीत की किसी धार्मिक परंपरा या शृंखला की कड़ी नहीं था, बल्कि उसने एक नए मनुष्य का, एक नए जगत का सूत्रपात किया। ओशो सदा कहते थे कि वह कुछ नया नहीं... आगे पढ़े

हम क्यों खो देते हैं शांति

Updated on 18 January, 2015, 13:10
एक हिन्दू सन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचे। उन्होंने देखा कि वहां एक ही परिवार के कुछ लोग आपस में बात करते हुए एक दूसरे पर क्रोधित हो हो रहे थे। सन्यासी यह दृश्य देखकर रहा नहीं गया और उसने तुरंत अपने शिष्यो से पूछा... आगे पढ़े

दुखवाद का कारण

Updated on 17 January, 2015, 9:35
मनुष्य बहुत जटिल है. सुख की खोज करता है. सुख न मिले, तो दुख से राजी हो जाता है. क्योंकि खोज की भी एक सीमा है. फिर खोजते ही चले जाना व्यर्थ श्रम मालूम होता है. तो दुख से राजी हो जाता है. राजी ही नहीं होता, एक तरह का दुख... आगे पढ़े

भगवद्गीता के वक्ता श्रीकृष्ण

Updated on 16 January, 2015, 9:39
भगवद्गीता का मर्म भगवद्गीता में ही व्यक्त है. यह इस प्रकार है- यदि हमें किसी औषधि विशेष का सेवन करना हो तो उसमें लिखे निर्देशों का पालन करना होता है. हम मनमाने ढंग से या मित्र की सलाह से वह औषधि नहीं ले सकते. इसका सेवन लिखे हुए निर्देशों या चिकित्सक... आगे पढ़े

क्या वाकई में आप बुद्धिमान हैं?

Updated on 15 January, 2015, 12:49
हर इंसान, अपने जीवन में जाने-अनजाने अपनी एक खास छवि, एक खास शख्सियत बनाता है। अपने अंदर गढ़ी गई छवि का असलियत से कोई लेना-देना नहीं है। इसका आपके अस्तित्व, आपकी भीतरी प्रकृति से कोई संबंध नहीं है। यह एक खास छवि है, जो आपने खुद, बहुत हद तक अनजाने में,... आगे पढ़े

परम आनंद का भाव

Updated on 14 January, 2015, 9:52
परम आनन्द को समझा नहीं जा सकता. परमानन्द की स्थिति पाना अत्यन्त कठिन है. कई जीवन-कालों के बाद परमानन्द की प्राप्ति होती है. और इस स्थिति से बाहर निकलना और भी कठिन है. जीवन में तुम्हें तलाश है केवल परमानन्द की. अपने स्रेत के साथ तुम्हारा दिव्य मिलन और संसार में... आगे पढ़े