Wednesday, 20 September 2017, 11:46 PM

उपदेश

जीवन की वचनबद्धता

Updated on 1 January, 2014, 13:04
बहती हुई नदी का पानी एक विशेष दिशा में बहता है, जबकि बाढ़ की अवस्था में पानी बिना किसी क्रम के दिशाविहीन होकर बहता है. इसी प्रकार हमारे जीवन में यदि ऊर्जा को कोई दिशा प्रदान नहीं की जाती है तो यह दिग्भ्रमित हो जाती है. जीवन की ऊर्जा के ... आगे पढ़े

हर जीवात्मा के साथ भगवान

Updated on 29 December, 2013, 21:50
प्रश्न किया जा सकता है कि जब कृष्ण का सबके लिए सम्भाव है और उनको कोई विशिष्ट मित्र नहीं है तो फिर वे उन भक्तों में विशेष रुचि क्यों लेते हैं, जो सदैव उनकी दिव्य सेवा में सदैव लगे रहते हैं? किन्तु यह भेदभाव नहीं है, यह सहज है. इस जगत... आगे पढ़े

अकारण कुछ भी नहीं

Updated on 29 December, 2013, 21:49
इस जगत में बिना कारण कुछ भी नहीं हो सकता. और कारण केवल दो ही हो सकते हैं, या तो कामना हो, या करुणा हो. या तो मैं कुछ लेने आपके घर आऊं या कुछ देने आऊं. आपके घर या तो लेने कुछ आऊं  तो कामना हो या कुछ देने आऊं... आगे पढ़े

दिन के समय भूलकर भी नहीं करें यह दो काम

Updated on 29 December, 2013, 21:29
ईश्वर ने दिन और रात बनाकर यह भी निर्धारित कर दिया है कि दिन के समय सूर्य देव होंगे तो रात के समय चंद्रमा। इसी तरह संसार के कार्यों का भी विभाजन किया है। कुछ काम भगवान ने दिन के लिए बनाए हैं तो कुछ काम रात के लिए। जैसे रात... आगे पढ़े

क्या आपने खुशी का वास्तविक मतलब समझा है?

Updated on 26 December, 2013, 13:55
स्वामी निरंजन योगी व्यक्ति अपने हर उद्देश्य में सुख और प्रसन्नता की ही खोज करता है। हर किसी के मन में सुख की कामना होती है। पर खुशी या प्रसन्नता को परिभाषित नहीं किया जा सकता। ज्यादा से ज्यादा यही कहा जा सकता है कि वह तमाम नकारात्मक संवेदनाओं का अभाव... आगे पढ़े

ज्ञानी होते भी, तब बेकार हो जाता है आपका ज्ञान

Updated on 25 December, 2013, 9:33
एक बार सत्संग के दौरान परम भागवत संत अखंडानंद सरस्वती ने अपने गुरु उड़िया बाबा से पूछा, महाराज, पंडित कौन है? उड़िया बाबा ने बताया, शास्त्र में कहा गया है- आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्म नित्यता। यमर्थात्राकर्षन्ति स वै पंडित उच्यते। अर्थात, जिन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान है, जो धर्मानुसार जीवन... आगे पढ़े

प्रेम तो प्रेम है

Updated on 21 December, 2013, 11:19
अगर आपको परमात्मा की कृपा मिलती है तो आपके व्यक्तित्व का रूपांतरण हो सकता है। प्रेम आप पिता से करें, मां से करें या परमात्मा से करें, प्रेम तो प्रेम है। आप ठंडा पानी पीकर अपना मन शांत करें या मरुभूमि में फेंक दें, इससे पानी को कोई अंतर नहीं... आगे पढ़े

क्या ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी बने रहने का फायदा जानते हैं?

Updated on 20 December, 2013, 15:36
राजगृह के राजकीय कोषाध्यक्ष की पुत्री भद्रा बचपन से ही प्रतिभाशाली थी। उसने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध एक युवक से विवाह कर लिया। विवाह के बाद उसे पता चला कि वह अपराधी किस्म का है। एक दिन उस युवक ने भद्रा की हत्या का प्रयास किया, पर भद्रा ने अपनी... आगे पढ़े

क्या आप भी बात-चीत करते हुए ऐसी ही गलती करते हैं

Updated on 20 December, 2013, 9:59
धर्मशास्त्रों में वाणी संयम पर बहुत बल दिया गया है। मनुस्मृति में कहा गया है, पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः। असंबद्ध प्रलापश्च वांग्मयं स्याच्चतुर्विधम्। अर्थात, वाणी में कठोरता लाना, झूठ बोलना, परनिंदा करना और व्यर्थ बातें बनाना- ये वाणी के चार दोष हैं। इन दोषों से बचने वाला व्यक्ति हमेशा... आगे पढ़े

असफलता भी दे जाती है खुशी

Updated on 19 December, 2013, 22:18
कृष्ण भगवान गीता में कहते हैं , ‘देवी ध्येषा गुणमयी मम माया दुरंत्यया’ अर्थात यह जो माया है, देवी गुण युक्त है. यह दिव्य है, दुरत्यं है. इससे आसानी से पार नहीं हो सकते, बिना मेरी कृपा के. मेरी ही कृपा से मेरी माया से तुम बाहर आ सकते हो. तुम... आगे पढ़े

ज्ञान वही है जो हमें सत्य की ओर ले जाए

Updated on 19 December, 2013, 15:16
ज्ञान वही है जो हमें सत्य की ओर ले जाए और सत्य वही है जो धर्म को स्थापित करे। ज्ञान तत्व प्रकाश जैसा होता है, जिससे वस्तुत: मनुष्य का जीवन रूपांतरित होता है। जीवन अर्थपूर्ण और यथार्थ के धरातल तक पहुंचता है। वहीं दूसरी तरफ अज्ञान से मनुष्य का समस्त... आगे पढ़े

आत्मा की चेतना को जगाने वाला ध्यान

Updated on 19 December, 2013, 13:02
उलझनों या आवेशों पर नियंत्रण जब तक नहीं होता, तब तक शक्ति का विकास कठिन है। इसलिए आज सबसे बड़ी मांग है कि प्रत्येक व्यक्ति ध्यान में प्रवेश करें। शक्ति के लिए जरूरी है कि शरीर और मन साथ में जुड़े रहें। शरीर एक काम करता है, तो मन दूसरा... आगे पढ़े

व्यवहार की शालीनता

Updated on 18 December, 2013, 11:14
सद्व्यवहार उस पुष्प के समान है जो धवल और दृढ़ चरित्र रूपी वृक्ष पर खिलता है। व्यवहार की शालीनता न केवल अन्य व्यक्तियों को प्रसन्न करती है, बल्कि शालीन व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को भी आनंदित करती है। प्रख्यात विचारक और मनीषी श्रीअरविंद का कहना था कि जीवन के समस्त बाहरी क्रियाकलाप... आगे पढ़े

महाज्ञानी बनना है तो इस रहस्य को समझ लें

Updated on 17 December, 2013, 12:58
संसार में किसी से भी कह दें कि तुम अज्ञानी हो तो वह आपको मारने-पीटने के लिए दौड़ेगा। कारण यह है कि कोई भी अपने आपको अज्ञानी मानने को तैयार नहीं होता। जबकि सच तो यह है कि बड़ी-बड़ी उपाधियां और डिग्रियां लेकर ऊंचे पदों पर काम करने वाले व्यक्ति... आगे पढ़े

आत्मा को पता होता है उसे कौन सा शरीर मिलने वाला है

Updated on 17 December, 2013, 12:56
स्वामी शिवानंद सरस्वती जीवात्मा प्राण, मन तथा इंद्रियों के साथ मृत्यु के समय अपने पूर्व शरीर को छोड़ देती है और एक नया शरीर धारण करती है। अविद्या, शुभ-अशुभ कर्म तथा पूर्वजन्मों के संस्कारों को भी वह अपने साथ ही ले जाती है। जिस प्रकार कीड़ा दूसरी घास पर अपने पांवों... आगे पढ़े

ध्यान-तन्मयता का नाम समाधि

Updated on 16 December, 2013, 13:17
ध्यान के द्वारा परिवर्तन तभी संभव है जब ध्यान में जाने के लिए गहरी आस्था हो. आस्था का निर्माण हुए बिना ध्यान में जाने की क्षमता अर्जित नहीं हो सकती. कुछ व्यक्तियों में नैसर्गिक आस्था होती है और कुछ व्यक्तियों की आस्था का निर्माण करना पड़ता है. आस्था पर संकल्प का... आगे पढ़े

उस सेठ ने दान मांगने आई भगिनी निवेदिता को थप्पर क्यों मारा?

Updated on 9 December, 2013, 22:15
भगिनी निवेदिता ने एक दिन देखा कि स्वामी विवेकानंद कह रहे थे कि बेसहारा अनाथ बच्चे साक्षात भगवान के समान हैं। यह सुनकर भगिनी निवेदिता ने संकल्प ले लिया कि वह बंगाल में अनाथ बच्चों के कल्याण के लिए एक आश्रम की स्थापना करेंगी। इसके लिए वह कोलकाता के धनाढ्यों... आगे पढ़े

बहुत जरूरी है वक्त पर सही फैसला लेना

Updated on 7 December, 2013, 12:15
कभी-कभी दो अच्छे इंसान भी साथ रहकर एक दूसरे की जिंदगी को दुखद बना देते हैं। वे अलग-अलग तो अच्छे होते हैं, पर आपस में घुल-मिल नहीं पाते। मेरी दोस्त रोहिणी के साथ ऐसा ही हुआ। उसकी अरेंज मैरिज को कुछ ही दिन हुए थे कि उसे लगा उसने गलत... आगे पढ़े

बुद्घि जरूरी है लेकिन अधिक बुद्घि नुकसान का कारण बन सकता है

Updated on 3 December, 2013, 8:43
संसार में धन दौलत से भी जिस चीज को अधिक महत्व दिया गया है वह है बुद्घि। लेकिन कहते हैं अगर बुद्घि जरूरत से अधिक हो जाए तो यह भी नुकसान कर जाती है। क्योंकि जितनी बुद्घि होगी उतना ही अधिक तर्क लगाएंगे परिणाम तर्क कुतर्क बन जाएगा। कुतर्क से... आगे पढ़े

धन दौलत नहीं घर को यह स्वर्ग बना देता है

Updated on 2 December, 2013, 8:09
सुधांशु जी महाराज अध्यात्मिक गुरु भारत वर्ष में एक महान् कूटनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य हुए हैं। उन्होंने कहा है वह गृहस्थाश्रम धन्य है, स्वर्ग तुल्य है जिस गृहस्थाश्रम में ये विशेषताएं हों।      जिस घर में सदा प्रसन्नता दिखाई देती हो, जिस घर में हंसने की, मुस्कराने की स्थिति दिखाई देती हो, हंसने की... आगे पढ़े