Saturday, 23 June 2018, 3:57 AM

उपदेश

करना होगा सघन प्रयास

Updated on 15 February, 2014, 13:32
उद्यम उस आध्यात्मिक प्रयास को कहते हैं, जिससे तुम इस कारागृह के बाहर होने की चेष्टा करते हो. वही भैरव है. भैरव शब्द पारिभाषिक है. ‘भ’ का अर्थ भरण, ‘र’ का रवण और ‘व’ का वमन. भरण का अर्थ धारण, रवण का संहार और वमन का फैलाना है. भैरव का अर्थ... आगे पढ़े

भक्ति की विविध विधियां

Updated on 14 February, 2014, 20:52
भक्ति के दो प्रकार हैं, विधि विधानों से पूर्ण तथा भगवत्प्रेम की आसक्ति से पूर्ण. किन्तु जो लोग कृष्णभावनामृत के नियमों का पालन नहीं कर सकते, उनके लिए ज्ञान का अनुशीलन श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञान से मनुष्य अपनी वास्तविक स्थिति को समझने में समर्थ होता है. यही ज्ञान क्रमश: ध्यान तक... आगे पढ़े

सफलता का सोपान

Updated on 13 February, 2014, 15:29
जब आप अपनी सीमा निर्धारित करतें हैं तो अपनी चेतना को सीमित करते हैं, अपनी शक्ति को सीमित करते हैं. जब आप सफल होते हैं तो गर्वित अनुभव करतें हैं और यदि असफल होते हैं तो ग्लानि या तनाव में आ जाते हैं. इन दोनों के कारण आप आनंद से वंचित... आगे पढ़े

दुख का कारण लौकिक आनंद

Updated on 13 February, 2014, 15:27
महर्षि वशिष्ठ ने दु:खों का कारण अज्ञान बताते हुए उससे मुक्त होने का उपाय ज्ञान साधना बताया है. उनका कथन है कि आधि, व्याधि अर्थात मानसिक और शारीरिक परेशानी की निवृत्ति विद्या यानी ज्ञान द्वारा होती है. इस दु:ख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है. दु:खों का अत्यंत अभाव ही... आगे पढ़े

'मौत और भगवान का ध्यान रखो'

Updated on 12 February, 2014, 21:49
आगरा। क्रांतिकारी जैन संत तरुण सागर महाराज ने मंगलवार को अपने कड़वे प्रवचनों से श्रोताओं के जीवन की मिठास घोलने का प्रयास किया। हंसी की फुहारों के बीच उन्होंने जीवन में आने वाले दुखों की चर्चा की और समय आते अपने जीवन में सुधार करने का संदेश दिया। एमडी जैन इंटर... आगे पढ़े

सुखी जीवन का उपहार

Updated on 9 February, 2014, 13:31
ज्ञान बांटने से बढ़ता है. यदि इसे आप अपने तक ही सीमित रखेंगे तो यह खत्म हो जाएगा. अब कैसे इस ज्ञान को फैलाना है, इसके लिए निपुणता की आवश्यकता है. कई लोग ऐसे हैं, जिनके जीवन में मन की गहराई और सच्चाई (लगन) का नाम नहीं. लोगों को इस तथ्य... आगे पढ़े

प्रेम परमात्मा का प्रतिनिधि है

Updated on 8 February, 2014, 13:54
ज्ञान का कोई सम्बन्ध विचार से नहीं है. जितना तुम पढ़ोगे, सुनोगे, संग्रह करोगे-स्मृति भारी होती जाएगी. केवल शब्दों के कारण तुम्हें भ्रांति हो जायेगी कि मैं ज्ञानी हो गया हूं. ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुवा, पंडित भया न कोय. ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.’ कबीर के लिए... आगे पढ़े

मन और बुद्धि रहे प्रभु में लीन

Updated on 7 February, 2014, 16:53
वास्तव में हम शरीर से नहीं, अपितु मन तथा बुद्धि से कर्म करते हैं. अतएव यदि मन तथा बुद्धि सदैव परमेश्वर के विचार में मग्न रहें तो स्वाभाविक है, इन्द्रियां भी उनकी सेवा में लगी रहेंगी. भगवद्गीता हमें सिखाती है कि किस प्रकार मन तथा बुद्धि को भगवान के विचार में... आगे पढ़े

गणपति का संदेश

Updated on 4 February, 2014, 12:59
मान्यता है श्रीकृष्ण की तरह आदिदेव गणपति ने भी संदेश दिए थे, जिन्हें गणेशगीता में पढ़ा जा सकता है। इस ग्रंथ में योगशास्त्र का विस्तार से वर्णन है, जो व्यक्ति को बुराइयों के अंधकार से अच्छाइयों के प्रकाश की ओर ले जाता है। ब्रह्मावैवर्तपुराण में स्वयं भगवान कृष्ण मंगलमूर्ति गणेशजी को... आगे पढ़े

वसंत पंचमी: वाणी का संयम

Updated on 4 February, 2014, 12:57
वाग्देवी सरस्वती की पूजा का अभिप्राय यह है कि हम अपनी वाणी पर संयम रखें, उनके हंस की तरह नीर-क्षीर विवेकी बनें और ज्ञान में पारंगत हों। माघ मास के शुक्लपक्ष की पंचमी (वसंत पंचमी) को वाग्देवी सरस्वती का आविर्भाव-दिवस माना गया है। अत: यह तिथि 'वागीश्वरी जयंती' के रूप में... आगे पढ़े

सच्चाई-ईमानदारी

Updated on 3 February, 2014, 13:42
एक व्यक्ति ने छोटे स्तर से काम शुरू किया और अपनी कंपनी का टर्नओवर करोड़ों तक पहुंचा दिया। यह सब उसकी सच्चाई, ईमानदारी, लगन और मेहनत का प्रतिफल था। वृद्धावस्था में जब वह काम से रिटायर होना चाहता था, तब उसने अपनी कंपनी के ही ईमानदार अधिकारियों में से किसी को... आगे पढ़े

मृत्यु के धुएं में अमृत की लौ

Updated on 1 February, 2014, 22:36
जीवन एक बड़ी संपदा है, लेकिन आदमी सिवाय उसे फेंकने और गंवाने के कुछ भी नहीं करता है! जीवन क्या है, यह भी पता नहीं चल पाता और हम उसे फेंक देते हैं! जीवन में क्या छिपा था- कौन-से राज, कौन-सा रहस्य, कौन-सा स्वर्ग, कौन-सा आनंद, कौन-सी मुक्ति- उस सबका... आगे पढ़े

दुरूह है कृष्ण का द्विभुज रूप

Updated on 1 February, 2014, 22:34
विरूप से आगे कृष्ण का द्विभुज रूप है, जिसे ब्रह्मा तथा शिव जैसे बड़े-बड़े देवताओं द्वारा भी देख पाना कठिन है. जब भगवान कृष्ण माता देवकी के गर्भ में थे, तो स्वर्ग के सारे देवता कृष्ण के चमत्कार देखने के लिए आये. जैसा कि ब्रह्मसंहिता तथा स्वयं कृष्ण द्वारा भगवद्गीता... आगे पढ़े

इंकार नहीं करेंगे, करोड़ों रुपये का एक चीज आपके पास भी है

Updated on 1 February, 2014, 11:36
भगवान ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रुप में कुछ विभूतियां दी हैं। इन्हें सोचना, विचारना, बोलना भावनाएं, सिद्धियां-विभूतियां कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएं कमाए और अपने लिए... आगे पढ़े

वेदों में समाया है ज्ञान

Updated on 31 January, 2014, 13:32
वेद का अर्थ है ज्ञान। ऋग्वैदिक ऋषियों ने गंगा-सभ्यता की इन दिव्य रचनाओं के मंत्रों अर्थात श्लोकों को स्वयं का सृजन नहीं माना है, उन्होंने स्वयं को मात्र दृष्टा कहा है। अर्थात उन्हें उन मंत्रों (श्लोकों) की मात्र अनुभूति हुई। इन्हीं मंत्रों में गायत्री मंत्र भी सम्मिलित है, जिसे प्रमुख... आगे पढ़े

आलोचना

Updated on 30 January, 2014, 16:44
नवविवाहित जोड़ा एक नए घर में रहने पहुंचा। उनके घर की मुख्य खिड़की में शीशे लगे हुए थे, जिससे दूसरे घर की छत दिखाई देती थी। अगली सुबह पत्नी ने पति से कहा, देखो, सामने वाली छत पर कितने मैले कपड़े फैलाए हुए हैं। लगता है उन्हें कपड़े साफ करना... आगे पढ़े

गंगा एवं पर्यावरण स्वच्छता का महायज्ञ

Updated on 30 January, 2014, 16:42
ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन आश्रम में अपने देश के अतिरिक्त चीन, ब्राजील, जापान, दक्षिण अफ्रीका, नीदरलैंड, फ्रांस, तुर्की आदि देशों के अनेक लोग आए थे योग-जिज्ञासु बनकर, लेकिन जब अपने देश वापस गए तो वे गंगा और पर्यावरण की स्वच्छता के हिमायती बन चुके थे। यहां चल रहा योग विज्ञान... आगे पढ़े

मां और मौत के जैसा है जीवन और मृत्यु का संबंध

Updated on 29 January, 2014, 15:10
यहां जीवन चाहिए हो तो मृत्यु के बिना नहीं हो सकेगा। तो एक अर्थ में अंधेरा प्रकाश का विरोधी भी है और एक अर्थ में सहयोगी भी। ये दोनों बातें खयाल में रखना। विरोधी इस अर्थ में कि अंधेरे से ठीक उलटा है। सहयोगी इस अर्थ में कि बिना अंधेरे... आगे पढ़े

कर के देखिए, तीन प्रार्थनाएं जो आपके जीवन को बदल सकती है

Updated on 29 January, 2014, 15:08
समाज में समय-समय पर अनेक-अनेक लोग मिलते रहते हैं, उनकी अलग-अलग तरह की पीड़ाएं, समस्याएं सामने आती हैं। उनके वचन सुनने से पता लगता है कि आधुनिनिकता के इस युग में चिन्ता, भय, निराशा, हताशा, छल-कपट इतना बढ़ गया है कि व्यक्ति अन्दर से खोखला हो गया है। हमने अनुभव किए... आगे पढ़े

जो जागेगा, वही पाएगा

Updated on 28 January, 2014, 16:33
जागरूक होकर हम कोई भी उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं। फिर हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं रह जाता.. अध्यात्म विमुख होने का नहीं, बल्कि संपृक्त होने का संदेश देता है। वह चेतना को जगाने की बात करता है। अपनी चेतना को जाग्रत रख पाने के लिए ही यह मानव... आगे पढ़े

रामकृष्ण परमहंस: आचरण में उतरे, वही ज्ञान

Updated on 28 January, 2014, 16:32
सिर्फ पढ़ने या जानने से ज्ञान नहीं मिलता, उसे आचरण में अपनाने से मिलता है.. जिस ज्ञान से चित्तशुद्धि होती है, वही यथार्थ ज्ञान है, बाकी सब अज्ञान है। कोरे पांडित्य का क्या लाभ? पंडित को बहुत सारे शास्त्र, अनेक श्लोक मुखाग्र हो सकते हैं, पर वह सब केवल रटने... आगे पढ़े

जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ाए वही गुरु है

Updated on 27 January, 2014, 21:59
गुरु व शिष्य का संबंध साधारण सांसारिक नाता नहीं है, बल्कि यह पूर्णरूपेण आत्मिक व आध्यात्मिक संबंध है। सद्गुरू हमें सत्पथ पर अग्रसर करते हैं, सत स्वरूप आत्मा व परमात्मा का बोध कराते हैं। उन सद्गुरू की महिमा मानव रूप में अवतार धारण करके परमात्मा ने भी स्वीकार की है। शिष्य... आगे पढ़े

शरीर-व्यापी है आत्मा

Updated on 27 January, 2014, 12:25
प्रेक्षा-ध्यान का एक प्रयोग है- चैतन्य-केंद्रों का ध्यान. यह शरीर-प्रेक्षा का ही विकसित रूप है. अल्पकालिक शरीर-प्रेक्षा में एक-एक अवयव पर थोड़े समय के लिए ध्यान केंद्रित होता है, उसमें यह संभव नहीं है. प्रत्येक अवयव पर दीर्घकालिक प्रेक्षा का अभ्यास हो तो ध्यानस्थ व्यक्ति चैतन्य-केंद्रों तक पहुंच जाता है.... आगे पढ़े

गणतंत्र दिवस: स्वयं का अनुशासन

Updated on 26 January, 2014, 15:12
गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं 'मनुष्य को अपना उद्धार खुद करना चाहिए, न कि पतन'। हम दंड के भय से सरकारी कानूनों का पालन तो करते हैं, पर खुद को अनुशासित नहीं रख पाते। अपने अधिकार को समझने के साथ-साथ हर किसी को सुखी देखना चाहते हैं,... आगे पढ़े

निर्धारित नहीं है साधना-मार्ग

Updated on 26 January, 2014, 10:36
महावीर का बहुत व्यवस्थित उपक्रम था. साधना में कभी व्यवस्थित उपक्रम नहीं होता. महावीर के लिए साधना का एक अभिनय था, जिसको उन्होंने सुचारू रूप से पूरा किया. महावीर ने बिलकुल कलाकार की तरह व्यक्तित्व को खड़ा किया. सुनियोजित था मामला. क्या उन्हें करना है इस व्यक्तित्व से, उसकी पूरी तैयारी... आगे पढ़े

वंदे मातरम गीत को लिखने वाले से जब मिलने आया वह संन्यासी

Updated on 25 January, 2014, 13:51
वंदे मातरम और आनंदमठ के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी की विद्वता से अंग्रेज भी प्रभावित थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें न्यायाधीश नियुक्त किया था। पद पर रहते हुए उन्होंने जनता पर किए गए अत्याचार के आरोप में अनेक गोरे अफसरों को दंडित कर अपनी निर्भीकता का परिचय दिया था। बंकिम बाबू के... आगे पढ़े

भवबंधन से मुक्ति का मार्ग

Updated on 24 January, 2014, 13:09
जो मनुष्य भगवान के आविर्भाव के सत्य को समझ लेता है, वह इस भवबंधन से मुक्त हो जाता है और इस शरीर को छोड़ते ही वह तुरन्त भगवान के धाम को लौट जाता है. भवबंधन से जीव की ऐसी मुक्ति सरल नहीं है. निर्विशेषवादी तथा योगीजन पर्याप्त कष्ट तथा अनेकानेक जन्मों... आगे पढ़े

अपनी-अपनी दुनिया

Updated on 24 January, 2014, 13:07
संसार के समस्त पदार्थ विशेष प्रकार के परमाणुओं की भागती-दौड़ती हलचल मात्र हैं. हमारी आंखें जैसा देखती हैं, आवश्यक नहीं, दूसरों को भी वैसा ही दिखे. दृष्टि के मंद, तीव्र, रुग्ण, निरोग होने की दशा में दृश्य बदल जाते हैं. एक को सामने का दृश्य एक प्रकार का दिखता है, तो... आगे पढ़े

महत्मा बुद्घ के जीवन की एक प्रेरक कथा

Updated on 23 January, 2014, 12:33
दार्शनिकों ने इंद्रियों के संयम को जीवन की सफलता का प्रमुख साधन कहा है। मन पर नियंत्रण करके ही इंद्रिय संयम संभव है। वाणी का जितना हो सके, कम उपयोग करने में ही कल्याण है। वाणी पर संयम करनेवाला किसी की निंदा के पाप, कटु वचन बोलकर शत्रु बनाने की... आगे पढ़े

शंका की बीमारी

Updated on 22 January, 2014, 7:44
हम कितनी सारी चीजें सीखते हैं पर हमने यह नहीं सीखा की मन की पीड़ा से कैसे बचें. हम छोटी सी बात का बतंगड़ बनाते हैं. दूसरों के बोले हुए दो-चार शब्दों को इधर-उधर खींचते रहते हैं. क्या आपकी जिंदगी का इससे ज्यादा कोई महत्व नहीं है? क्यों आप अपनी प्रशंसा... आगे पढ़े

साँच कहै ता मारन धावै