healthprosegs phenterminehttps://buypropeciaonlinecheap.com/ उपदेश

Thursday, 21 September 2017, 5:53 PM

उपदेश

गणतंत्र दिवस: स्वयं का अनुशासन

Updated on 26 January, 2014, 15:12
गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं 'मनुष्य को अपना उद्धार खुद करना चाहिए, न कि पतन'। हम दंड के भय से सरकारी कानूनों का पालन तो करते हैं, पर खुद को अनुशासित नहीं रख पाते। अपने अधिकार को समझने के साथ-साथ हर किसी को सुखी देखना चाहते हैं,... आगे पढ़े

निर्धारित नहीं है साधना-मार्ग

Updated on 26 January, 2014, 10:36
महावीर का बहुत व्यवस्थित उपक्रम था. साधना में कभी व्यवस्थित उपक्रम नहीं होता. महावीर के लिए साधना का एक अभिनय था, जिसको उन्होंने सुचारू रूप से पूरा किया. महावीर ने बिलकुल कलाकार की तरह व्यक्तित्व को खड़ा किया. सुनियोजित था मामला. क्या उन्हें करना है इस व्यक्तित्व से, उसकी पूरी तैयारी... आगे पढ़े

वंदे मातरम गीत को लिखने वाले से जब मिलने आया वह संन्यासी

Updated on 25 January, 2014, 13:51
वंदे मातरम और आनंदमठ के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी की विद्वता से अंग्रेज भी प्रभावित थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें न्यायाधीश नियुक्त किया था। पद पर रहते हुए उन्होंने जनता पर किए गए अत्याचार के आरोप में अनेक गोरे अफसरों को दंडित कर अपनी निर्भीकता का परिचय दिया था। बंकिम बाबू के... आगे पढ़े

भवबंधन से मुक्ति का मार्ग

Updated on 24 January, 2014, 13:09
जो मनुष्य भगवान के आविर्भाव के सत्य को समझ लेता है, वह इस भवबंधन से मुक्त हो जाता है और इस शरीर को छोड़ते ही वह तुरन्त भगवान के धाम को लौट जाता है. भवबंधन से जीव की ऐसी मुक्ति सरल नहीं है. निर्विशेषवादी तथा योगीजन पर्याप्त कष्ट तथा अनेकानेक जन्मों... आगे पढ़े

अपनी-अपनी दुनिया

Updated on 24 January, 2014, 13:07
संसार के समस्त पदार्थ विशेष प्रकार के परमाणुओं की भागती-दौड़ती हलचल मात्र हैं. हमारी आंखें जैसा देखती हैं, आवश्यक नहीं, दूसरों को भी वैसा ही दिखे. दृष्टि के मंद, तीव्र, रुग्ण, निरोग होने की दशा में दृश्य बदल जाते हैं. एक को सामने का दृश्य एक प्रकार का दिखता है, तो... आगे पढ़े

महत्मा बुद्घ के जीवन की एक प्रेरक कथा

Updated on 23 January, 2014, 12:33
दार्शनिकों ने इंद्रियों के संयम को जीवन की सफलता का प्रमुख साधन कहा है। मन पर नियंत्रण करके ही इंद्रिय संयम संभव है। वाणी का जितना हो सके, कम उपयोग करने में ही कल्याण है। वाणी पर संयम करनेवाला किसी की निंदा के पाप, कटु वचन बोलकर शत्रु बनाने की... आगे पढ़े

शंका की बीमारी

Updated on 22 January, 2014, 7:44
हम कितनी सारी चीजें सीखते हैं पर हमने यह नहीं सीखा की मन की पीड़ा से कैसे बचें. हम छोटी सी बात का बतंगड़ बनाते हैं. दूसरों के बोले हुए दो-चार शब्दों को इधर-उधर खींचते रहते हैं. क्या आपकी जिंदगी का इससे ज्यादा कोई महत्व नहीं है? क्यों आप अपनी प्रशंसा... आगे पढ़े

शांत सरोवर है हमारा चित्त

Updated on 21 January, 2014, 14:08
अक्सर प्रश्न उठता है कि शरीर-प्रेक्षा की प्रक्रिया क्या है! सबसे पहली बात है मन का प्रत्याहार. मन को बाहर से भीतर की ओर ले जाना तथा यह अभ्यास करना कि वह अभ्यासकाल से बाहर न लौटे. इस प्रतिसंलीनता के बाद शरीर-दर्शन का क्रम शुरू हो जाता है. पैर के अंगूठे... आगे पढ़े

आदि-अनादि है प्रेम

Updated on 19 January, 2014, 12:24
कबीर कहते हैं- ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुवा, पंडित हुआ न कोय. ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.’ हिंदी में जो शब्द है-प्रेम, उसमें ढाई अक्षर हैं; लेकिन कबीर का मतलब गहरा है. जब भी कोई व्यक्ति किसी के प्रेम में गिरता है, तो वहां ढाई अक्षर प्रेम के पूरे... आगे पढ़े

चिंतन में प्रेम हो, चिंता नहीं

Updated on 19 January, 2014, 12:22
कुछ आसुरी लोग भी कृष्ण का चिन्तन करते हैं किन्तु ईर्ष्यावश-जिस तरह कंस करता था. वह सदैव चिन्ताग्रस्त रहता था और सोचता था कि न जाने कब कृष्ण उसका वध कर दें. इस प्रकार के चिन्तन से कोई लाभ नहीं होने वाला है. मनुष्य को चाहिए कि भक्तिमय प्रेम में उनका... आगे पढ़े

निर्मल जल

Updated on 17 January, 2014, 12:58
महात्मा बुद्ध अपने शिष्य के संग जंगल से गुजर रहे थे। दोपहर को एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने रुके। उन्होंने शिष्य से कहा कि प्यास लग रही है, कहीं पानी मिले, तो लेकर आओ। शिष्य एक पहाड़ी झरने से लगी झील से पानी लेने गया। झील से कुछ पशु... आगे पढ़े

सार्थक प्रश्न

Updated on 17 January, 2014, 12:55
यूनान के महान दार्शनिक सुकरात के पास एक व्यक्ति आया और बोला, 'मैंने आपके दोस्त के बारे में ऐसी बात सुनी है, जिसे सुनकर आप चकित रह जाएंगे?' सुकरात ने कहा, एक मिनट ठहरो। मेरे दोस्त के बारे में कुछ भी बताने से पहले मैं तुमसे कुछ सवाल करना चाहता... आगे पढ़े

कण-कण में बसी चेतना

Updated on 16 January, 2014, 22:43
अलग-अलग दिखते हुए भी हम चेतना के धरातल पर एक-दूसरे से जुड़े हैं. मनुष्य में जो चैतन्य सत्ता हलचल कर रही है, वही सम्पूर्ण जगत एवं प्राणी पदार्थ में विद्यमान है. महान पुरुषों ने इसे ही व्यक्त करते हुए कहा है कि ब्रह्मांड और पिंड में, व्यष्टि एवं समष्टि में जितनी... आगे पढ़े

ओशो का चिंतन..जीवन में सतत क्रांति

Updated on 15 January, 2014, 17:57
क्रांति आज के समय में सतत चलती रहती है। इसका हिस्सा बनना चाहते हैं तो बदलाव के लिए तैयार रहना होगा। ओशो का चिंतन.. अतीत के इतिहास में क्रांतियां होती थीं और समाप्त हो जाती थीं, लेकिन आज हम सतत क्रांति में जी रहे हैं। पहले क्रांति एक घटना थी, अब... आगे पढ़े

अहिंसा से अभय की ओर..

Updated on 15 January, 2014, 17:55
जो व्यक्ति जितना भयभीत होता है, वह उतना ही हिंसक हो जाता है। इसलिए भय को पराजित करने यानी अभय पाने और देने के लिए अहिंसा का वरण करना होगा। आचार्य तुलसी के जन्मशती वर्ष पर उनका चिंतन.. हिंसा हम उसे मानते हैं, जिसके तहत एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की जान... आगे पढ़े

शरीर नौका है, जीव नाविक

Updated on 13 January, 2014, 11:40
साधना के उपक्रम में शरीर का बहुत महत्व है. जिस प्रकार सोपान पर चले बिना ऊपर की मंजिल में जाना असंभव है. उसी प्रकार शरीर को साधे बिना आत्म-साधना संभव नहीं है. तर्क हो सकता है कि लिफ्ट मिल जाए तो सोपान का क्या करना है? सीधी छलांग भरी जा सकती... आगे पढ़े

नवजागरण के अग्रदूत स्वामी विवेकानंद

Updated on 12 January, 2014, 20:48
भारतभूमि के कालजयी युवाचार्य स्वामी विवेकानंद भारतीय नवजागरण के अग्रदूत माने जाते हैं. विदेशों में भारतीय संस्कृति की विजय पताका लहराने वाले इस युवा संन्यासी की विचार संजीवनी इतनी सशक्त है कि राष्ट्र का एक बड़ा युवावर्ग आज भी उनके व्यक्तित्व व विचारों से अपने जीवन की दिशा व दशा... आगे पढ़े

महावीर ही क्यों रहे याद!

Updated on 11 January, 2014, 19:47
यह साधना सत्य को पाने के लिए नहीं है. सत्य तो पा लिया गया है. लेकिन अगर विशिष्ट तरह के सत्य देने हों तो उस सत्य को बांटना, पाने से ज्यादा कठिन है. जैसे कृष्ण का सत्य बिल्कुल निर्विशेष है. कृष्ण जैसी जिंदगी में हैं, वहीं से उसको देने की कोशिश... आगे पढ़े

सेवक भाव से हो कर्म

Updated on 10 January, 2014, 17:50
जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तो वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता. उसे चाहिए कि वह सेवक की भांति परमेश्वर के निर्देशानुसार कर्म करे. सेवक को स्वतंत्रता नहीं रहती. वह केवल अपने स्वामी के आदेश पर कार्य करता है. उस पर लाभ-हानि का कोई प्रभाव... आगे पढ़े

जिनकी वाणी सूर्य के समान मन को प्रकाशित करती है

Updated on 10 January, 2014, 12:40
भारतीय संस्कृति में गुरु को अत्यंत महत्व दिया गया है। स्कंदपुराण में कहा गया है, अज्ञान तिमिरंधश्च ज्ञानांजनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः।। यानी जो गुरु अज्ञान के अंधकार में दृष्टिहीन बने बच्चे अबोध शिष्य की आंखों को ज्ञान का अंजन लगाकर अलोकित करता है, उससे अधिक प्रणम्य कौन है? पिता... आगे पढ़े

सिद्धि का द्वार है योग

Updated on 9 January, 2014, 16:07
सर्वागपूर्ण योग पद्धति के चार प्रमुख अंग हैं- शुद्धि, मुक्ति, सिद्धि और भुक्ति. साधना की प्रथम अनिवार्य आवश्यकता है-शुद्धि. विभिन्न उपदिष्ट साधना प्रणालियों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है. यह अंत: और बाह्य दोनों के परिशोधन का प्रयास है. शुद्धि की शुरुआत होती है, समता के दिग्दर्शन से. साधक निम्न प्रकृति की सभी... आगे पढ़े

शब्द से परे दिव्य संगीत

Updated on 9 January, 2014, 16:06
जीवन बहुत ही सतही हो जाता है, जब हम जीवन को शब्दों में जीते हैं. जो कुछ भी जीवन में महत्वपूर्ण है, सारयुक्त है, वह तो शब्दों में व्यक्त ही नहीं किया जा सकता. प्रेम का अनुभव, सही कृतज्ञता शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकते. वास्तविक सौंदर्य और सच्ची मित्रता में... आगे पढ़े

चह्वाण ने सीएम से की आदर्श जांच आयोग की शिकायत

Updated on 7 January, 2014, 20:21
मुंबई। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण का कहना है कि आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच करने वाले आयोग की रिपोर्ट में उनके साथ न्याय नहीं किया गया और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इस संबंध में उन्होंने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण और राज्य के मुख्य सचिव जेएस... आगे पढ़े

इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा

Updated on 7 January, 2014, 12:25
आगरा। प्रेम और सद्भावना की बातें। संकीर्ण मनोवृत्ति को त्याग मानवता के कल्याण की प्रेरणा। इन्हीं विषयों पर आधारित था निरंकारी संत बाबा हरदेव सिंह का प्रवचन, जिन्हें सुनने और ग्रहण करने के लिए रविवार को हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। कोठी मीना बाजार में हुए निरंकारी संत समागम की... आगे पढ़े

भ्रांतियों की जननी है बहिमरुखता

Updated on 6 January, 2014, 9:49
ध्यान का अर्थ है- चित्त को भीतर लाना. अध्यात्म का अर्थ है- अंतर्मुखी बनना. ऐसी स्थिति में चित्त को एकाग्र बनाने के लिए कोई उपाय न करना साधना के पथ में भटकना है, क्योंकि एकाग्रता और निर्मलता के बिना साधना का विकास नहीं हो सकता. मनुष्य की वृत्तियां दो प्रकार की... आगे पढ़े

संसार एक यात्रा-स्थल है

Updated on 5 January, 2014, 12:31
संसार एक यात्रा-स्थल है। यहां सभी जीव अपने पूर्व संचित कर्मो के अनुसार जीवन-यात्रा पर आते हैं। सभी जीवधारियों में मनुष्य ही ऐसा श्रेष्ठ जीव है, जिसके पास बुद्धि और विवेक है। इनके उपयोग से मनुष्य सही जीवन-मार्ग अपनाकर वर्तमान जन्म और भावी जन्म को अच्छा और सुंदर बना सकता... आगे पढ़े

लेने और देने का मनोविज्ञान

Updated on 4 January, 2014, 20:46
यह अकारण नहीं है कि महावीर और बुद्ध भिक्षा मांगते रहे. क्योंकि आप उस आदमी को बर्दाश्त ही नहीं कर सकते जो सिर्फ देता चला जाए. आप उसके दुश्मन हो जाएंगे. अब यह बहुत उल्टा लगेगा देखने में कि जो आदमी आपको देता ही चला जाए, आप उसके दुश्मन हो जाएंगे.... आगे पढ़े

भक्ति करने से मिलती है शक्ति

Updated on 3 January, 2014, 16:37
आगरा। श्रीमद् भागवत सप्ताह में पं.मयंक शास्त्री ने कहा है कि भक्ति करने से शक्ति मिलती है। उसी से जीवन का उद्धार हो सकता है। शीतला गली, फुलट्टी बाजार में हो रही इस भागवत कथा में गुरुवार को श्री शास्त्री ने स्वरूप सेवा और नाम सेवा पर जोर दिया। कहा... आगे पढ़े

विद्या का अभ्युदय

Updated on 2 January, 2014, 13:23
अग्नि की ऊर्जा जहां भी उत्पन्न होती है, वह समीपवर्ती वातावरण को ऊर्जायुक्त बनाए बिना नहीं रहती. सुगन्ध का भी यही उपक्रम है. वह जहां भी रखी जाती है, समीपवर्ती क्षेत्र में भी वैसी ही गन्ध फैलाती रहती है. विद्या के सम्बन्ध में भी यही समझा जाना चाहिए. अनौचित्य से... आगे पढ़े

शरीर पर नियंत्रण अनिवार्य

Updated on 1 January, 2014, 13:06
कोई भी साधना-पद्धति एकांगी नहीं हो सकती. उसमें शरीर, मन और आत्मा- तीनों को साधने के उपक्रम बताए जाते हैं. क्योंकि तीनों परस्पर संबद्ध हैं और एक-दूसरे के प्रभाव से प्रभावित होते हैं. प्रेक्षाध्यान की साधना में तीन गुप्तियों का महत्वपूर्ण स्थान है. इनमें सबसे पहली है-कायगुप्ति. कायगुप्ति अर्थात शरीर... आगे पढ़े