Saturday, 18 November 2017, 7:19 PM

उपदेश

दुरूह है कृष्ण का द्विभुज रूप

Updated on 1 February, 2014, 22:34
विरूप से आगे कृष्ण का द्विभुज रूप है, जिसे ब्रह्मा तथा शिव जैसे बड़े-बड़े देवताओं द्वारा भी देख पाना कठिन है. जब भगवान कृष्ण माता देवकी के गर्भ में थे, तो स्वर्ग के सारे देवता कृष्ण के चमत्कार देखने के लिए आये. जैसा कि ब्रह्मसंहिता तथा स्वयं कृष्ण द्वारा भगवद्गीता... आगे पढ़े

इंकार नहीं करेंगे, करोड़ों रुपये का एक चीज आपके पास भी है

Updated on 1 February, 2014, 11:36
भगवान ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रुप में कुछ विभूतियां दी हैं। इन्हें सोचना, विचारना, बोलना भावनाएं, सिद्धियां-विभूतियां कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएं कमाए और अपने लिए... आगे पढ़े

वेदों में समाया है ज्ञान

Updated on 31 January, 2014, 13:32
वेद का अर्थ है ज्ञान। ऋग्वैदिक ऋषियों ने गंगा-सभ्यता की इन दिव्य रचनाओं के मंत्रों अर्थात श्लोकों को स्वयं का सृजन नहीं माना है, उन्होंने स्वयं को मात्र दृष्टा कहा है। अर्थात उन्हें उन मंत्रों (श्लोकों) की मात्र अनुभूति हुई। इन्हीं मंत्रों में गायत्री मंत्र भी सम्मिलित है, जिसे प्रमुख... आगे पढ़े

आलोचना

Updated on 30 January, 2014, 16:44
नवविवाहित जोड़ा एक नए घर में रहने पहुंचा। उनके घर की मुख्य खिड़की में शीशे लगे हुए थे, जिससे दूसरे घर की छत दिखाई देती थी। अगली सुबह पत्नी ने पति से कहा, देखो, सामने वाली छत पर कितने मैले कपड़े फैलाए हुए हैं। लगता है उन्हें कपड़े साफ करना... आगे पढ़े

गंगा एवं पर्यावरण स्वच्छता का महायज्ञ

Updated on 30 January, 2014, 16:42
ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन आश्रम में अपने देश के अतिरिक्त चीन, ब्राजील, जापान, दक्षिण अफ्रीका, नीदरलैंड, फ्रांस, तुर्की आदि देशों के अनेक लोग आए थे योग-जिज्ञासु बनकर, लेकिन जब अपने देश वापस गए तो वे गंगा और पर्यावरण की स्वच्छता के हिमायती बन चुके थे। यहां चल रहा योग विज्ञान... आगे पढ़े

मां और मौत के जैसा है जीवन और मृत्यु का संबंध

Updated on 29 January, 2014, 15:10
यहां जीवन चाहिए हो तो मृत्यु के बिना नहीं हो सकेगा। तो एक अर्थ में अंधेरा प्रकाश का विरोधी भी है और एक अर्थ में सहयोगी भी। ये दोनों बातें खयाल में रखना। विरोधी इस अर्थ में कि अंधेरे से ठीक उलटा है। सहयोगी इस अर्थ में कि बिना अंधेरे... आगे पढ़े

कर के देखिए, तीन प्रार्थनाएं जो आपके जीवन को बदल सकती है

Updated on 29 January, 2014, 15:08
समाज में समय-समय पर अनेक-अनेक लोग मिलते रहते हैं, उनकी अलग-अलग तरह की पीड़ाएं, समस्याएं सामने आती हैं। उनके वचन सुनने से पता लगता है कि आधुनिनिकता के इस युग में चिन्ता, भय, निराशा, हताशा, छल-कपट इतना बढ़ गया है कि व्यक्ति अन्दर से खोखला हो गया है। हमने अनुभव किए... आगे पढ़े

जो जागेगा, वही पाएगा

Updated on 28 January, 2014, 16:33
जागरूक होकर हम कोई भी उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं। फिर हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं रह जाता.. अध्यात्म विमुख होने का नहीं, बल्कि संपृक्त होने का संदेश देता है। वह चेतना को जगाने की बात करता है। अपनी चेतना को जाग्रत रख पाने के लिए ही यह मानव... आगे पढ़े

रामकृष्ण परमहंस: आचरण में उतरे, वही ज्ञान

Updated on 28 January, 2014, 16:32
सिर्फ पढ़ने या जानने से ज्ञान नहीं मिलता, उसे आचरण में अपनाने से मिलता है.. जिस ज्ञान से चित्तशुद्धि होती है, वही यथार्थ ज्ञान है, बाकी सब अज्ञान है। कोरे पांडित्य का क्या लाभ? पंडित को बहुत सारे शास्त्र, अनेक श्लोक मुखाग्र हो सकते हैं, पर वह सब केवल रटने... आगे पढ़े

जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ाए वही गुरु है

Updated on 27 January, 2014, 21:59
गुरु व शिष्य का संबंध साधारण सांसारिक नाता नहीं है, बल्कि यह पूर्णरूपेण आत्मिक व आध्यात्मिक संबंध है। सद्गुरू हमें सत्पथ पर अग्रसर करते हैं, सत स्वरूप आत्मा व परमात्मा का बोध कराते हैं। उन सद्गुरू की महिमा मानव रूप में अवतार धारण करके परमात्मा ने भी स्वीकार की है। शिष्य... आगे पढ़े

शरीर-व्यापी है आत्मा

Updated on 27 January, 2014, 12:25
प्रेक्षा-ध्यान का एक प्रयोग है- चैतन्य-केंद्रों का ध्यान. यह शरीर-प्रेक्षा का ही विकसित रूप है. अल्पकालिक शरीर-प्रेक्षा में एक-एक अवयव पर थोड़े समय के लिए ध्यान केंद्रित होता है, उसमें यह संभव नहीं है. प्रत्येक अवयव पर दीर्घकालिक प्रेक्षा का अभ्यास हो तो ध्यानस्थ व्यक्ति चैतन्य-केंद्रों तक पहुंच जाता है.... आगे पढ़े

गणतंत्र दिवस: स्वयं का अनुशासन

Updated on 26 January, 2014, 15:12
गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं 'मनुष्य को अपना उद्धार खुद करना चाहिए, न कि पतन'। हम दंड के भय से सरकारी कानूनों का पालन तो करते हैं, पर खुद को अनुशासित नहीं रख पाते। अपने अधिकार को समझने के साथ-साथ हर किसी को सुखी देखना चाहते हैं,... आगे पढ़े

निर्धारित नहीं है साधना-मार्ग

Updated on 26 January, 2014, 10:36
महावीर का बहुत व्यवस्थित उपक्रम था. साधना में कभी व्यवस्थित उपक्रम नहीं होता. महावीर के लिए साधना का एक अभिनय था, जिसको उन्होंने सुचारू रूप से पूरा किया. महावीर ने बिलकुल कलाकार की तरह व्यक्तित्व को खड़ा किया. सुनियोजित था मामला. क्या उन्हें करना है इस व्यक्तित्व से, उसकी पूरी तैयारी... आगे पढ़े

वंदे मातरम गीत को लिखने वाले से जब मिलने आया वह संन्यासी

Updated on 25 January, 2014, 13:51
वंदे मातरम और आनंदमठ के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी की विद्वता से अंग्रेज भी प्रभावित थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें न्यायाधीश नियुक्त किया था। पद पर रहते हुए उन्होंने जनता पर किए गए अत्याचार के आरोप में अनेक गोरे अफसरों को दंडित कर अपनी निर्भीकता का परिचय दिया था। बंकिम बाबू के... आगे पढ़े

भवबंधन से मुक्ति का मार्ग

Updated on 24 January, 2014, 13:09
जो मनुष्य भगवान के आविर्भाव के सत्य को समझ लेता है, वह इस भवबंधन से मुक्त हो जाता है और इस शरीर को छोड़ते ही वह तुरन्त भगवान के धाम को लौट जाता है. भवबंधन से जीव की ऐसी मुक्ति सरल नहीं है. निर्विशेषवादी तथा योगीजन पर्याप्त कष्ट तथा अनेकानेक जन्मों... आगे पढ़े

अपनी-अपनी दुनिया

Updated on 24 January, 2014, 13:07
संसार के समस्त पदार्थ विशेष प्रकार के परमाणुओं की भागती-दौड़ती हलचल मात्र हैं. हमारी आंखें जैसा देखती हैं, आवश्यक नहीं, दूसरों को भी वैसा ही दिखे. दृष्टि के मंद, तीव्र, रुग्ण, निरोग होने की दशा में दृश्य बदल जाते हैं. एक को सामने का दृश्य एक प्रकार का दिखता है, तो... आगे पढ़े

महत्मा बुद्घ के जीवन की एक प्रेरक कथा

Updated on 23 January, 2014, 12:33
दार्शनिकों ने इंद्रियों के संयम को जीवन की सफलता का प्रमुख साधन कहा है। मन पर नियंत्रण करके ही इंद्रिय संयम संभव है। वाणी का जितना हो सके, कम उपयोग करने में ही कल्याण है। वाणी पर संयम करनेवाला किसी की निंदा के पाप, कटु वचन बोलकर शत्रु बनाने की... आगे पढ़े

शंका की बीमारी

Updated on 22 January, 2014, 7:44
हम कितनी सारी चीजें सीखते हैं पर हमने यह नहीं सीखा की मन की पीड़ा से कैसे बचें. हम छोटी सी बात का बतंगड़ बनाते हैं. दूसरों के बोले हुए दो-चार शब्दों को इधर-उधर खींचते रहते हैं. क्या आपकी जिंदगी का इससे ज्यादा कोई महत्व नहीं है? क्यों आप अपनी प्रशंसा... आगे पढ़े

शांत सरोवर है हमारा चित्त

Updated on 21 January, 2014, 14:08
अक्सर प्रश्न उठता है कि शरीर-प्रेक्षा की प्रक्रिया क्या है! सबसे पहली बात है मन का प्रत्याहार. मन को बाहर से भीतर की ओर ले जाना तथा यह अभ्यास करना कि वह अभ्यासकाल से बाहर न लौटे. इस प्रतिसंलीनता के बाद शरीर-दर्शन का क्रम शुरू हो जाता है. पैर के अंगूठे... आगे पढ़े

आदि-अनादि है प्रेम

Updated on 19 January, 2014, 12:24
कबीर कहते हैं- ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुवा, पंडित हुआ न कोय. ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.’ हिंदी में जो शब्द है-प्रेम, उसमें ढाई अक्षर हैं; लेकिन कबीर का मतलब गहरा है. जब भी कोई व्यक्ति किसी के प्रेम में गिरता है, तो वहां ढाई अक्षर प्रेम के पूरे... आगे पढ़े

चिंतन में प्रेम हो, चिंता नहीं

Updated on 19 January, 2014, 12:22
कुछ आसुरी लोग भी कृष्ण का चिन्तन करते हैं किन्तु ईर्ष्यावश-जिस तरह कंस करता था. वह सदैव चिन्ताग्रस्त रहता था और सोचता था कि न जाने कब कृष्ण उसका वध कर दें. इस प्रकार के चिन्तन से कोई लाभ नहीं होने वाला है. मनुष्य को चाहिए कि भक्तिमय प्रेम में उनका... आगे पढ़े

निर्मल जल

Updated on 17 January, 2014, 12:58
महात्मा बुद्ध अपने शिष्य के संग जंगल से गुजर रहे थे। दोपहर को एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने रुके। उन्होंने शिष्य से कहा कि प्यास लग रही है, कहीं पानी मिले, तो लेकर आओ। शिष्य एक पहाड़ी झरने से लगी झील से पानी लेने गया। झील से कुछ पशु... आगे पढ़े

सार्थक प्रश्न

Updated on 17 January, 2014, 12:55
यूनान के महान दार्शनिक सुकरात के पास एक व्यक्ति आया और बोला, 'मैंने आपके दोस्त के बारे में ऐसी बात सुनी है, जिसे सुनकर आप चकित रह जाएंगे?' सुकरात ने कहा, एक मिनट ठहरो। मेरे दोस्त के बारे में कुछ भी बताने से पहले मैं तुमसे कुछ सवाल करना चाहता... आगे पढ़े

कण-कण में बसी चेतना

Updated on 16 January, 2014, 22:43
अलग-अलग दिखते हुए भी हम चेतना के धरातल पर एक-दूसरे से जुड़े हैं. मनुष्य में जो चैतन्य सत्ता हलचल कर रही है, वही सम्पूर्ण जगत एवं प्राणी पदार्थ में विद्यमान है. महान पुरुषों ने इसे ही व्यक्त करते हुए कहा है कि ब्रह्मांड और पिंड में, व्यष्टि एवं समष्टि में जितनी... आगे पढ़े

ओशो का चिंतन..जीवन में सतत क्रांति

Updated on 15 January, 2014, 17:57
क्रांति आज के समय में सतत चलती रहती है। इसका हिस्सा बनना चाहते हैं तो बदलाव के लिए तैयार रहना होगा। ओशो का चिंतन.. अतीत के इतिहास में क्रांतियां होती थीं और समाप्त हो जाती थीं, लेकिन आज हम सतत क्रांति में जी रहे हैं। पहले क्रांति एक घटना थी, अब... आगे पढ़े

अहिंसा से अभय की ओर..

Updated on 15 January, 2014, 17:55
जो व्यक्ति जितना भयभीत होता है, वह उतना ही हिंसक हो जाता है। इसलिए भय को पराजित करने यानी अभय पाने और देने के लिए अहिंसा का वरण करना होगा। आचार्य तुलसी के जन्मशती वर्ष पर उनका चिंतन.. हिंसा हम उसे मानते हैं, जिसके तहत एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की जान... आगे पढ़े

शरीर नौका है, जीव नाविक

Updated on 13 January, 2014, 11:40
साधना के उपक्रम में शरीर का बहुत महत्व है. जिस प्रकार सोपान पर चले बिना ऊपर की मंजिल में जाना असंभव है. उसी प्रकार शरीर को साधे बिना आत्म-साधना संभव नहीं है. तर्क हो सकता है कि लिफ्ट मिल जाए तो सोपान का क्या करना है? सीधी छलांग भरी जा सकती... आगे पढ़े

नवजागरण के अग्रदूत स्वामी विवेकानंद

Updated on 12 January, 2014, 20:48
भारतभूमि के कालजयी युवाचार्य स्वामी विवेकानंद भारतीय नवजागरण के अग्रदूत माने जाते हैं. विदेशों में भारतीय संस्कृति की विजय पताका लहराने वाले इस युवा संन्यासी की विचार संजीवनी इतनी सशक्त है कि राष्ट्र का एक बड़ा युवावर्ग आज भी उनके व्यक्तित्व व विचारों से अपने जीवन की दिशा व दशा... आगे पढ़े

महावीर ही क्यों रहे याद!

Updated on 11 January, 2014, 19:47
यह साधना सत्य को पाने के लिए नहीं है. सत्य तो पा लिया गया है. लेकिन अगर विशिष्ट तरह के सत्य देने हों तो उस सत्य को बांटना, पाने से ज्यादा कठिन है. जैसे कृष्ण का सत्य बिल्कुल निर्विशेष है. कृष्ण जैसी जिंदगी में हैं, वहीं से उसको देने की कोशिश... आगे पढ़े

सेवक भाव से हो कर्म

Updated on 10 January, 2014, 17:50
जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तो वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता. उसे चाहिए कि वह सेवक की भांति परमेश्वर के निर्देशानुसार कर्म करे. सेवक को स्वतंत्रता नहीं रहती. वह केवल अपने स्वामी के आदेश पर कार्य करता है. उस पर लाभ-हानि का कोई प्रभाव... आगे पढ़े