Sunday, 28 May 2017, 10:08 PM

उपदेश

शरीर नौका है, जीव नाविक

Updated on 13 January, 2014, 11:40
साधना के उपक्रम में शरीर का बहुत महत्व है. जिस प्रकार सोपान पर चले बिना ऊपर की मंजिल में जाना असंभव है. उसी प्रकार शरीर को साधे बिना आत्म-साधना संभव नहीं है. तर्क हो सकता है कि लिफ्ट मिल जाए तो सोपान का क्या करना है? सीधी छलांग भरी जा सकती... आगे पढ़े

नवजागरण के अग्रदूत स्वामी विवेकानंद

Updated on 12 January, 2014, 20:48
भारतभूमि के कालजयी युवाचार्य स्वामी विवेकानंद भारतीय नवजागरण के अग्रदूत माने जाते हैं. विदेशों में भारतीय संस्कृति की विजय पताका लहराने वाले इस युवा संन्यासी की विचार संजीवनी इतनी सशक्त है कि राष्ट्र का एक बड़ा युवावर्ग आज भी उनके व्यक्तित्व व विचारों से अपने जीवन की दिशा व दशा... आगे पढ़े

महावीर ही क्यों रहे याद!

Updated on 11 January, 2014, 19:47
यह साधना सत्य को पाने के लिए नहीं है. सत्य तो पा लिया गया है. लेकिन अगर विशिष्ट तरह के सत्य देने हों तो उस सत्य को बांटना, पाने से ज्यादा कठिन है. जैसे कृष्ण का सत्य बिल्कुल निर्विशेष है. कृष्ण जैसी जिंदगी में हैं, वहीं से उसको देने की कोशिश... आगे पढ़े

सेवक भाव से हो कर्म

Updated on 10 January, 2014, 17:50
जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तो वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता. उसे चाहिए कि वह सेवक की भांति परमेश्वर के निर्देशानुसार कर्म करे. सेवक को स्वतंत्रता नहीं रहती. वह केवल अपने स्वामी के आदेश पर कार्य करता है. उस पर लाभ-हानि का कोई प्रभाव... आगे पढ़े

जिनकी वाणी सूर्य के समान मन को प्रकाशित करती है

Updated on 10 January, 2014, 12:40
भारतीय संस्कृति में गुरु को अत्यंत महत्व दिया गया है। स्कंदपुराण में कहा गया है, अज्ञान तिमिरंधश्च ज्ञानांजनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः।। यानी जो गुरु अज्ञान के अंधकार में दृष्टिहीन बने बच्चे अबोध शिष्य की आंखों को ज्ञान का अंजन लगाकर अलोकित करता है, उससे अधिक प्रणम्य कौन है? पिता... आगे पढ़े

सिद्धि का द्वार है योग

Updated on 9 January, 2014, 16:07
सर्वागपूर्ण योग पद्धति के चार प्रमुख अंग हैं- शुद्धि, मुक्ति, सिद्धि और भुक्ति. साधना की प्रथम अनिवार्य आवश्यकता है-शुद्धि. विभिन्न उपदिष्ट साधना प्रणालियों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है. यह अंत: और बाह्य दोनों के परिशोधन का प्रयास है. शुद्धि की शुरुआत होती है, समता के दिग्दर्शन से. साधक निम्न प्रकृति की सभी... आगे पढ़े

शब्द से परे दिव्य संगीत

Updated on 9 January, 2014, 16:06
जीवन बहुत ही सतही हो जाता है, जब हम जीवन को शब्दों में जीते हैं. जो कुछ भी जीवन में महत्वपूर्ण है, सारयुक्त है, वह तो शब्दों में व्यक्त ही नहीं किया जा सकता. प्रेम का अनुभव, सही कृतज्ञता शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकते. वास्तविक सौंदर्य और सच्ची मित्रता में... आगे पढ़े

चह्वाण ने सीएम से की आदर्श जांच आयोग की शिकायत

Updated on 7 January, 2014, 20:21
मुंबई। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण का कहना है कि आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच करने वाले आयोग की रिपोर्ट में उनके साथ न्याय नहीं किया गया और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इस संबंध में उन्होंने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण और राज्य के मुख्य सचिव जेएस... आगे पढ़े

इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा

Updated on 7 January, 2014, 12:25
आगरा। प्रेम और सद्भावना की बातें। संकीर्ण मनोवृत्ति को त्याग मानवता के कल्याण की प्रेरणा। इन्हीं विषयों पर आधारित था निरंकारी संत बाबा हरदेव सिंह का प्रवचन, जिन्हें सुनने और ग्रहण करने के लिए रविवार को हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। कोठी मीना बाजार में हुए निरंकारी संत समागम की... आगे पढ़े

भ्रांतियों की जननी है बहिमरुखता

Updated on 6 January, 2014, 9:49
ध्यान का अर्थ है- चित्त को भीतर लाना. अध्यात्म का अर्थ है- अंतर्मुखी बनना. ऐसी स्थिति में चित्त को एकाग्र बनाने के लिए कोई उपाय न करना साधना के पथ में भटकना है, क्योंकि एकाग्रता और निर्मलता के बिना साधना का विकास नहीं हो सकता. मनुष्य की वृत्तियां दो प्रकार की... आगे पढ़े

संसार एक यात्रा-स्थल है

Updated on 5 January, 2014, 12:31
संसार एक यात्रा-स्थल है। यहां सभी जीव अपने पूर्व संचित कर्मो के अनुसार जीवन-यात्रा पर आते हैं। सभी जीवधारियों में मनुष्य ही ऐसा श्रेष्ठ जीव है, जिसके पास बुद्धि और विवेक है। इनके उपयोग से मनुष्य सही जीवन-मार्ग अपनाकर वर्तमान जन्म और भावी जन्म को अच्छा और सुंदर बना सकता... आगे पढ़े

लेने और देने का मनोविज्ञान

Updated on 4 January, 2014, 20:46
यह अकारण नहीं है कि महावीर और बुद्ध भिक्षा मांगते रहे. क्योंकि आप उस आदमी को बर्दाश्त ही नहीं कर सकते जो सिर्फ देता चला जाए. आप उसके दुश्मन हो जाएंगे. अब यह बहुत उल्टा लगेगा देखने में कि जो आदमी आपको देता ही चला जाए, आप उसके दुश्मन हो जाएंगे.... आगे पढ़े

भक्ति करने से मिलती है शक्ति

Updated on 3 January, 2014, 16:37
आगरा। श्रीमद् भागवत सप्ताह में पं.मयंक शास्त्री ने कहा है कि भक्ति करने से शक्ति मिलती है। उसी से जीवन का उद्धार हो सकता है। शीतला गली, फुलट्टी बाजार में हो रही इस भागवत कथा में गुरुवार को श्री शास्त्री ने स्वरूप सेवा और नाम सेवा पर जोर दिया। कहा... आगे पढ़े

विद्या का अभ्युदय

Updated on 2 January, 2014, 13:23
अग्नि की ऊर्जा जहां भी उत्पन्न होती है, वह समीपवर्ती वातावरण को ऊर्जायुक्त बनाए बिना नहीं रहती. सुगन्ध का भी यही उपक्रम है. वह जहां भी रखी जाती है, समीपवर्ती क्षेत्र में भी वैसी ही गन्ध फैलाती रहती है. विद्या के सम्बन्ध में भी यही समझा जाना चाहिए. अनौचित्य से... आगे पढ़े

शरीर पर नियंत्रण अनिवार्य

Updated on 1 January, 2014, 13:06
कोई भी साधना-पद्धति एकांगी नहीं हो सकती. उसमें शरीर, मन और आत्मा- तीनों को साधने के उपक्रम बताए जाते हैं. क्योंकि तीनों परस्पर संबद्ध हैं और एक-दूसरे के प्रभाव से प्रभावित होते हैं. प्रेक्षाध्यान की साधना में तीन गुप्तियों का महत्वपूर्ण स्थान है. इनमें सबसे पहली है-कायगुप्ति. कायगुप्ति अर्थात शरीर... आगे पढ़े

जीवन की वचनबद्धता

Updated on 1 January, 2014, 13:04
बहती हुई नदी का पानी एक विशेष दिशा में बहता है, जबकि बाढ़ की अवस्था में पानी बिना किसी क्रम के दिशाविहीन होकर बहता है. इसी प्रकार हमारे जीवन में यदि ऊर्जा को कोई दिशा प्रदान नहीं की जाती है तो यह दिग्भ्रमित हो जाती है. जीवन की ऊर्जा के ... आगे पढ़े

हर जीवात्मा के साथ भगवान

Updated on 29 December, 2013, 21:50
प्रश्न किया जा सकता है कि जब कृष्ण का सबके लिए सम्भाव है और उनको कोई विशिष्ट मित्र नहीं है तो फिर वे उन भक्तों में विशेष रुचि क्यों लेते हैं, जो सदैव उनकी दिव्य सेवा में सदैव लगे रहते हैं? किन्तु यह भेदभाव नहीं है, यह सहज है. इस जगत... आगे पढ़े

अकारण कुछ भी नहीं

Updated on 29 December, 2013, 21:49
इस जगत में बिना कारण कुछ भी नहीं हो सकता. और कारण केवल दो ही हो सकते हैं, या तो कामना हो, या करुणा हो. या तो मैं कुछ लेने आपके घर आऊं या कुछ देने आऊं. आपके घर या तो लेने कुछ आऊं  तो कामना हो या कुछ देने आऊं... आगे पढ़े

दिन के समय भूलकर भी नहीं करें यह दो काम

Updated on 29 December, 2013, 21:29
ईश्वर ने दिन और रात बनाकर यह भी निर्धारित कर दिया है कि दिन के समय सूर्य देव होंगे तो रात के समय चंद्रमा। इसी तरह संसार के कार्यों का भी विभाजन किया है। कुछ काम भगवान ने दिन के लिए बनाए हैं तो कुछ काम रात के लिए। जैसे रात... आगे पढ़े

क्या आपने खुशी का वास्तविक मतलब समझा है?

Updated on 26 December, 2013, 13:55
स्वामी निरंजन योगी व्यक्ति अपने हर उद्देश्य में सुख और प्रसन्नता की ही खोज करता है। हर किसी के मन में सुख की कामना होती है। पर खुशी या प्रसन्नता को परिभाषित नहीं किया जा सकता। ज्यादा से ज्यादा यही कहा जा सकता है कि वह तमाम नकारात्मक संवेदनाओं का अभाव... आगे पढ़े

ज्ञानी होते भी, तब बेकार हो जाता है आपका ज्ञान

Updated on 25 December, 2013, 9:33
एक बार सत्संग के दौरान परम भागवत संत अखंडानंद सरस्वती ने अपने गुरु उड़िया बाबा से पूछा, महाराज, पंडित कौन है? उड़िया बाबा ने बताया, शास्त्र में कहा गया है- आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्म नित्यता। यमर्थात्राकर्षन्ति स वै पंडित उच्यते। अर्थात, जिन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान है, जो धर्मानुसार जीवन... आगे पढ़े

प्रेम तो प्रेम है

Updated on 21 December, 2013, 11:19
अगर आपको परमात्मा की कृपा मिलती है तो आपके व्यक्तित्व का रूपांतरण हो सकता है। प्रेम आप पिता से करें, मां से करें या परमात्मा से करें, प्रेम तो प्रेम है। आप ठंडा पानी पीकर अपना मन शांत करें या मरुभूमि में फेंक दें, इससे पानी को कोई अंतर नहीं... आगे पढ़े

क्या ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी बने रहने का फायदा जानते हैं?

Updated on 20 December, 2013, 15:36
राजगृह के राजकीय कोषाध्यक्ष की पुत्री भद्रा बचपन से ही प्रतिभाशाली थी। उसने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध एक युवक से विवाह कर लिया। विवाह के बाद उसे पता चला कि वह अपराधी किस्म का है। एक दिन उस युवक ने भद्रा की हत्या का प्रयास किया, पर भद्रा ने अपनी... आगे पढ़े

क्या आप भी बात-चीत करते हुए ऐसी ही गलती करते हैं

Updated on 20 December, 2013, 9:59
धर्मशास्त्रों में वाणी संयम पर बहुत बल दिया गया है। मनुस्मृति में कहा गया है, पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः। असंबद्ध प्रलापश्च वांग्मयं स्याच्चतुर्विधम्। अर्थात, वाणी में कठोरता लाना, झूठ बोलना, परनिंदा करना और व्यर्थ बातें बनाना- ये वाणी के चार दोष हैं। इन दोषों से बचने वाला व्यक्ति हमेशा... आगे पढ़े

असफलता भी दे जाती है खुशी

Updated on 19 December, 2013, 22:18
कृष्ण भगवान गीता में कहते हैं , ‘देवी ध्येषा गुणमयी मम माया दुरंत्यया’ अर्थात यह जो माया है, देवी गुण युक्त है. यह दिव्य है, दुरत्यं है. इससे आसानी से पार नहीं हो सकते, बिना मेरी कृपा के. मेरी ही कृपा से मेरी माया से तुम बाहर आ सकते हो. तुम... आगे पढ़े

ज्ञान वही है जो हमें सत्य की ओर ले जाए

Updated on 19 December, 2013, 15:16
ज्ञान वही है जो हमें सत्य की ओर ले जाए और सत्य वही है जो धर्म को स्थापित करे। ज्ञान तत्व प्रकाश जैसा होता है, जिससे वस्तुत: मनुष्य का जीवन रूपांतरित होता है। जीवन अर्थपूर्ण और यथार्थ के धरातल तक पहुंचता है। वहीं दूसरी तरफ अज्ञान से मनुष्य का समस्त... आगे पढ़े

आत्मा की चेतना को जगाने वाला ध्यान

Updated on 19 December, 2013, 13:02
उलझनों या आवेशों पर नियंत्रण जब तक नहीं होता, तब तक शक्ति का विकास कठिन है। इसलिए आज सबसे बड़ी मांग है कि प्रत्येक व्यक्ति ध्यान में प्रवेश करें। शक्ति के लिए जरूरी है कि शरीर और मन साथ में जुड़े रहें। शरीर एक काम करता है, तो मन दूसरा... आगे पढ़े

व्यवहार की शालीनता

Updated on 18 December, 2013, 11:14
सद्व्यवहार उस पुष्प के समान है जो धवल और दृढ़ चरित्र रूपी वृक्ष पर खिलता है। व्यवहार की शालीनता न केवल अन्य व्यक्तियों को प्रसन्न करती है, बल्कि शालीन व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को भी आनंदित करती है। प्रख्यात विचारक और मनीषी श्रीअरविंद का कहना था कि जीवन के समस्त बाहरी क्रियाकलाप... आगे पढ़े

महाज्ञानी बनना है तो इस रहस्य को समझ लें

Updated on 17 December, 2013, 12:58
संसार में किसी से भी कह दें कि तुम अज्ञानी हो तो वह आपको मारने-पीटने के लिए दौड़ेगा। कारण यह है कि कोई भी अपने आपको अज्ञानी मानने को तैयार नहीं होता। जबकि सच तो यह है कि बड़ी-बड़ी उपाधियां और डिग्रियां लेकर ऊंचे पदों पर काम करने वाले व्यक्ति... आगे पढ़े

आत्मा को पता होता है उसे कौन सा शरीर मिलने वाला है

Updated on 17 December, 2013, 12:56
स्वामी शिवानंद सरस्वती जीवात्मा प्राण, मन तथा इंद्रियों के साथ मृत्यु के समय अपने पूर्व शरीर को छोड़ देती है और एक नया शरीर धारण करती है। अविद्या, शुभ-अशुभ कर्म तथा पूर्वजन्मों के संस्कारों को भी वह अपने साथ ही ले जाती है। जिस प्रकार कीड़ा दूसरी घास पर अपने पांवों... आगे पढ़े